



क्या कभी सोचा है तुम कितना लुटाते हो अपनी खुशियां मनाने में, लेकिन जेबें फट जाती हैं लोगों की दूसरों को रोटी खिलाने में।| गज़ब है तेरी कुदरत का नज़ारा भी कैसा कैसा इंसाब बना दिया तूने आजमाने में। दिखाने को दुःख तो सभी जताते हैं मगर कोई भी आंसू क्यों नहीं पोछता, अपनी रोटी में से एक किसी और को दे दूं इस बात को कोई क्यों नहीं सोचता।
जिस दिन इस देश के लोगों की सोच बदल जाएगी, यकीन मानिए हमारे देश में गरीबी व भुखमरी दूर दूर तक नज़र नहीं आएगी। अगर मरहम लगा सको तो किसी गरीब के ज़ख्मों पर ही लगाना, क्योंकि हकीम बहुत हैं बाजारों में अमीरों के इलाज़ की खातिर।
आज तक बस एक ही बात समझ नहीं आती, जो लोग गरीबों के हक के लिए लड़ते हैं वो कुछ वक़्त के बाद अमीर कैसे बन जाते हैं। सुला दिया उस बेबस मां ने भूखे बच्चे को ये कहकर, परियां आती ही होंगी सपनों में रोटियां लेकर।वो गरीब का बच्चा था, इसीलिए भूखा सो गया| पेट भरा उसका मगर वो तो अमीर के घर का कुत्ता था। जरा सोचिए…।




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