



कागज के इंसानों पर आग की निगरानी है, अंधी सत्ता के हाथों मासूमो को जान गवानी है. सवाल जहर का नहीं था, वो तो मैं पी गया, तकलीफ लोगों को तब हुई, जब मैं फिर भी जी गया, ये संगदिलों की दुनिया हैं, संभल कर चलना “ग़ालिब, यहाँ पलको पर बिठाते हैं नजरो से गिराने के लिए.. हर कोई यहाँ किसी न किसी पार्टी के विचारो का गुलाम हैं, इसलिए भारत का ये हाल हैं, किसान बेहाल हैं. नेता माला–माल हैं… हालात यही, आदमी अपने हिसाब से उपमाए बनाता है और फ़िर उसका इस्तेमाल भी अपने हिसाब से ही करता है। गिरगिट का अपनी जान बचाने के लिए रंग बदलना धोका है और आदमी का किसी की लुटिया डूबाने के लिये रंग बदलना भी वही।बहादुर लोगो को शेर कहा जाता है मगर डिस्कवरी चैनल देखो तो शेर राजा कभी भैंसे से लात तो कभी जंगली कुत्तो से मात खाते नज़र आते है। वैसे गिरगिट का फ़ेवर करके आपने मेनका गांधी के लिये नया आइडिया तैय्यार कर दिया है। वैसे बचपन से ही हमने भी कभी गधे कभी घोड़े और कभी-कभी सुअर का खिताब जीत कर उन नीरिह जानवरों पर अन्याय किया है। एकाध बार उन पर और लोमडी की चालाकी और सबसे अहम कुत्ते की वफ़ादारी पर भी नज़र डालियेगा, वफ़ादार इंसानों का भी तो भला करिए।
हमारी रहनुमाओ में भला इतना गुमां कैसे, हमारे जागने से, नींद में उनकी खलल कैसे, किसी को चांद चमकता नजर आता है, किसी को उसमें दाग नज़र आता है … हम “आह भी करते हैं तो हो जाते हैं “बदनाम”, वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहो होती…, तमाम उम्र हम एक-दूसरे से लड़ते रहे, मगर मरे तो बराबर में जा के लेट गए। सियासत को लहू पीने की लत है, वरना मुल्क में सब खैरियत है। दूर से देखके गर्मी में रेत को पानी समझ लिया, कुछ अच्छे लोगों ने अहंकार में खुद को सर्वज्ञानी समझ लिया, जो सौदागर डॉलर का हैं वो खेती को क्या आंकेगा, धरती रोटी ना देगी तो खाने में सोना फंकेगा, जिसकी जो नियत थी उसने वो बहाया, किसानों ने दूध तो सरकार ने खून बहाया।



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