



यूँ सड़क पर फ़ोन पर अपने दिनों पर बातें करते हुए हम मान लेते हैं कि ज़िन्दगी अभी भी जीने लायक है अचानक आती है कवियों की गुहार कि बाक़ी लोगों का क्या होगा अपनी तो सोच ली बाक़ी लोगों का क्या होगा । हम किसी सफर में नहीं हैं कोई पहाड़ी, नदी या बाग नहीं हम शहर के बीच हैं ये आम दिन हैं सड़क पर फ़ोन बजता है सैंकड़ों वाहनों के बीच बातें करते हैं हम जीवन के रंगों की बातें हैं दफ्तर के रंग बच्चों के रंग जैसे वर्षों से बसन्त ढूँढती औरत का रंग छत की मुण्डेर से आस्मान में चल पड़ते आदमी का रंग ख़ुद से ही छिपती जाती लड़की का रंग कुछ रंग वर्षों से धुँधले होते गए हैं और हम भूल ही जाते हैं उन्हें ।
- Advertisement -





You must be logged in to post a comment.