



दरभंगा, देशज टाइम्स। ला सकते तो वापस ला दो, उस सच्ची सच्चाई को। भ्रष्टाचार को भंग कर दो, कुछ कम कर दो महंगाई को।। घपले पर घपला कब तक होगा, कब तक भूखे मरेंगे लोग। कब तक आबरू लुटती रहेगी। कब तक रहेगा कुरिया में शोक।। दिन दुपहरे लुटे खजाना। बंद करो ढिठाई को। कब तक रारी रार करेंगे, कब जाएगी अन्याय की डोर। कब आएगा न्याय का मौसम, कब नाचेंगे आंगन में मोर।। ऐसा नियम बना दो दाता, छुए न लोग बुराई को। भ्रष्टाचार को भंग कर दो, ला सकते तो वापस ला दो, उस सच्ची सच्चाई को। भ्रष्टाचार को भंग कर दो, कुछ कम कर दो महंगाई को।
घपले पर घपला कब तक होगा, कब तक भूखे मरेंगे लोग। कब तक आबरू लुटती रहेगी। कब तक रहेगा कुरिया में शोक।। दिन दुपहरे लुटे खजाना। बंद करो ढिठाई को। कब तक रारी रार करेंगे, कब जाएगी अन्याय की डोर। कब आएगा न्याय का मौसम, कब नाचेंगे आंगन में मोर।। ऐसा नियम बना दो दाता, छुए न लोग बुराई को। भ्रष्टाचार को भंग कर दो, कुछ कम कर दो महंगाई को।। कुछ कम कर दो महंगाई को। साहेब हालात यही है। घर फूटे गलियारे निकले आंगन गायब हो गया। शासन और प्रशासन में अनुशासन ग़ायब हो गया ।
त्यौहारों का गला दबाया बदसूरत महंगाई ने आंख मिचोली हंसी ठिठोली छीना है तन्हाई ने फागुन गायब हुआ हमारा सावन गायब हो गया । शहरों ने कुछ टुकड़े फेंके गाँव अभागे दौड़ पड़े रंगों की परिभाषा पढ़ने कच्चे धागे दौड़ पड़े चूसा ख़ून मशीनों ने अपनापन ग़ायब हो गया । नींद हमारी खोई-खोई गीत हमारे रूठे हैं रिश्ते नाते बर्तन जैसे घर में टूटे-फूटे हैं आंख भरी है गोकुल की वृंदावन ग़ायब हो
गया ।







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