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फ़रवरी, 11, 2026
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Dt ये कहां आ गए हम यूं ही साथ-साथ चलते, दोस्तों अब भी समय है, सोच लो, जागो और सोच लो

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Dt ये कहां आ गए हम यूं ही साथ-साथ चलते, दोस्तों अब भी समय है, सोच लो, जागो और सोच लोदरभंगा, देशज टाइम्स। दोस्तों जीवन में हमेशा बेबाकी से सच को स्वीकार करो। हक की लड़ाई लड़ो। कभी बिना कम पैसे की मजदूरी मत करो। अगर पत्रकारिता में संघर्ष का माद्दा नहीं है, छोड़ दो लेकिन रहो तो जी-जान से लड़ो और जीत की कामयाबी में अपना परचम लहराओ। ऐसे में, याद है, प्रस्तुत है पाश की कविता सिर्फ पत्रकारिता से जुड़े मित्रों, सहयोगियों व उन शुभचिंतकों के लिए जिन्होंने पत्रकारिता को रूह से महसूसा है जिस्म में उतारा है।

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.हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए

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हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी

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क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर
बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर
हाथों पर पड़े घट्टों की क़सम खाकर
हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे तब तक
जब तक वीरू बकरिहा
बकरियों का मूत पीता है
खिले हुए सरसों के फूल को
जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते
कि सूजी आँखों वाली
गाँव की अध्यापिका का पति जब तक
युद्ध से लौट नहीं आता

जब तक पुलिस के सिपाही
अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं
कि दफ़्तरों के बाबू
जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर

हम लड़ेंगे जब तक
दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है
जब तक बन्दूक न हुई, तब तक तलवार होगी
जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी
लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी

और हम लड़ेंगे साथी
हम लड़ेंगे
कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता
हम लड़ेंगे
कि अब तक लड़े क्यों नहीं
हम लड़ेंगे
अपनी सज़ा कबूलने के लिए
लड़ते हुए जो मर गए
उनकी याद ज़िन्दा रखने के लिए
हम लड़ेंगे …

अंत में मेरी ओर से बस इतना भर,
ये कहां आ गए हम यूं ही साथ-साथ चलते… दोस्तों अब भी समय है, सोच लो, जागो और सोच लो। मैं मनोरंजन आज अपने पुराने मित्र, सखा, हमेशा हौंसला देने वाला दरभंगा के नामचीन व्यंग्यकार वरिष्ठ युवा साथी राणा दत्ता के साथ..

Dt ये कहां आ गए हम यूं ही साथ-साथ चलते, दोस्तों अब भी समय है, सोच लो, जागो और सोच लो

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