



दरभंगा, देशज टाइम्स। ये आम दिन हैं, सड़क पर फ़ोन बजता है, सैंकड़ों वाहनों के बीच बातें करते हैं हम यूँ सड़क पर फ़ोन पर, अपने दिनों पर बातें करते हुए,हम मान लेते हैं कि ज़िन्दगी अभी भी जीने लायक है। मैं देर से इन्तज़ार में हूं कि एक दिन इसी सड़क पर ईश्वर की आवाज़ आएगी या चित्रगुप्त मुझे बतलाएगा मैं इसी सड़क पर उसे कहूंगा कि वह हत्यारों को पहचानने से कतराए नहीं और जब वह आए तो नाच भी ले तो मुझे क्या ग़लती से वह आ गया तो जो सच देखने से कतराते हैं वह उनके मुंह पर दे मारेगा। ऐसे में, सफ़र की हद है वहाँ तक कि कुछ निशान रहे। चले चलो के जहाँ तक ये आसमान रहे।
ये क्या उठाये क़दम और आ गई मंजिल, मज़ा तो जब है के पैरों में कुछ थकान रहे। वो शख़्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता है, तुम उस को दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे। मुझे ज़मीं की गहराईयों ने दाब लिया,मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे। कोई नही हैं जो ले इन सड़क दुर्घटनाओ की पूर्णतः ज़िम्मेदारी, क्या पता कल किसकी हो इस सड़क हादसे में मरने की बारी..।
दुर्घटना से देर भली सभी यह बखुभी जानते हैं, लेकिन वाहन चलाते समय भला लोग कहा ट्रॅफिक नियमो को मानते हैं..हेलमेट और सीट बेल्ट का महत्व सभी-भली भाति जानते हैं, अपने जीवन को दाव में लगा कहा अपनों का कहा मानते हैं..जिसे देखो जल्दबाज़ी में खामोखा अपनी गाड़ी की रफतार बढाए, गुज़ारिश हैं हमारी सबसे की मदिरा पीकर कृपिया गाड़ी न चलाए..।





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