



भ्रातृद्वितीया गीत
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मणिकांत झा, दरभंगा ही नहीं समस्त मिथिलांचल और देश की एक अलग ही साहित्यक धार हैं। इनकी भाषा और मिठास में धुला हर शब्द, फुल और सुगंध में मिश्रित होकर एक ऐसे अक्षर का निर्माण करता है, जो कविता रूपी विस्तार लेकर समस्त धरा को रसभाव के ओज से पूरित करने में खुद समर्थ, ऊर्जावन्वित महसूस करता है। आज इस पावन मौके पर प्रस्तुत है एक गीत, जो आज हर घर की उस पिठार से युक्त अरिपन से ओत है जहां भरदुतिया के जतरा मे कहीं भाई का परस्पर प्रेम है वहीं, भाई के इंतजार में बैठी बहना…
औसरा बैसल छी यौ भैया
अहींक आबक असरा मे
एतेक देरी कोनाक’ केलिए
भरदुतिया के जतरा मे।
गायक गोबर आँगन निपलहुँ
पारल हम ओहिपर अरिपन
पान सुपारी मटकूरी मे
बाट जोही पल-पल क्षण क्षण
अँकुरी आनल लालकाकी सँ
कुम्हरक फूलो बखरा मे
एतेक देरी कोनाक’ केलिए
भरदुतिया के जतरा मे।
भाइ बहीनक स्नेहक पाबनि
कोना बिसरि गेलिए भैया
भउजी तँ ने मना केली है
दीतहुँ जे हमरा रुपैय्या
कहबनि हमरा किछु नहि चाही
संठती अपना नहिरा मे
एतेक देरी कोनाक’ केलिए
भरदुतिया के जतरा मे।
जमुना नोतलनि यम के जहिना
अहाँके नोतब हम ओहिना
और्दा अहाँक बढ़य तहिना
जेना जल गंगा कृष्णा
मणिकांत संग शीघ्रे चलि आबी
पड़ी नहि कोनो लफरा मे
एतेक देरी कोनाक’ केलिए
भरदुतिया के जतरा मे।
–मणिकांत झा, दरभंगा,६-११-२१



