


दरभंगा, देशज टाइम्स ब्यूरो। ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव के कारण प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि हो रही है। इसके चलते हमारा मानवीय जीवन भी प्रभावित हो रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण ही जलवायु परिवर्तन में भी बदलाव आया है। इसी के कारण गर्मी के मौसम में वृद्धि हो रही है। ठंड के मौसम में कमी। वातावरण में कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर दिन-ब-दिन बढ़ रहा है। इससे लोगों को सांस लेने में समस्या उत्पन्न हो रही है। यदि इसी तरह की स्थिति कुछेक वर्षो तक जारी रही तो मानवीय सभ्यता को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यह बात स्वयंसेवी संस्था डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन व लनामिविवि के पीजी स्नातकोत्तर अंग्रेजी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ग्लोबल वार्मिंग का असर सेमिनार को संबोधित करते हुए पर्यावरण विशेषज्ञ सह एमएलएसएम कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. विद्यानाथ झा ने कही।

श्री झा ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर हमारे पर्यावरण पर पड़ता है। इससे समस्त सजीव जगत प्रभावित होते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान में निरंतर वृद्धि होने से हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ गया है। एक तरफ हिम ग्लेशियर पिघल रहा है। वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाने के कारण अनियंत्रित बारिश हो रही है। कहीं सूखा पड़ रहा है। ओजोन गैस की मोटी परत में क्षरण हो रहा है। भूस्खलन, भूकंप समेत अन्य प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि हो रही है। वहीं, कैंसर, मलेरिया, डेंगू, मानसिक अवसाद समेत अन्य बीमारियों से मानव ग्रसित हो रहे हैं। डॉ. झा ने ग्लोबल वार्मिंग को विस्तृत से समझाते हुए कहा कि इसे रोकना किसी एक व्यक्ति के वश में नहीं है।

इसके लिए पूरी मानव जाति को सामूहिक प्रयास करना होगा। चाहे हम घर में हो या बाहर, ऑफिस में हो या बाजार में हर जगह हमें पर्यावरण की सेहत के बारे में सोचकर ही कोई कार्य करना होगा। तब धीरे-धीरे ग्लोबल वार्मिंग का असर कम होगा। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ. अरूणिमा सिन्हा ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग नामक चेप्टर अब पीजी अंग्रेजी विभाग के विद्यार्थियों को भी पढ़ना पड़ेगा, क्योंकि इसे सिलेबस में जोड़ा जा चुका है। ग्लोबल वार्मिंग के बिगड़ते असंतुलन का प्रभाव आज पूरे विश्व में देखने को मिल रहा है। यदि वर्तमान गति से पर्यावरण प्रदूषण जारी रहा तो आने वाले चालीस वर्षो में पृथ्वी का तापमान इतना अधिक बढ़ जाएगा कि समुंद्र के जलस्तर में भारी वृद्धि होगी। तटवर्तीय इलाके जलमग्न हो जाएंगे। ग्लोबल वार्मिंग कम करने के लिए लोगों को विभिन्न माध्यमों के कूड़ा-करकट समाप्त करने होंगे।

वनों का संरक्षण करना होगा। पौधरोपण कार्यक्रम करने होंगे। बिजली के उपकरणों को अनावश्यक रूप से उपयोग रोकना होगा। सबसे बड़ी बात कार्बन डायोक्साइड का उत्सर्जन कम करना होगा। अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापन देते हुए अंग्रेजी विभाग की डॉ. पुनिता झा ने कहा कि वर्तमान समय की सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण प्रदूषण है। इसके कारण पूरी पृथ्वी प्रभावित हो रही है। समस्त सजीव जगत में अकेला मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। इसलिए इसे संवारने की जिम्मेदारी भी हम मानवों को ही उठाना पड़ेगा। सेमिनार का संचालन पीजी अंग्रेजी विभाग के छात्र विकास कुमार व शिवशंकर कुमार ने संयुक्त रूप से किया। आकांक्षा कुमारी, ऋृचा कश्यप, निशिथ आनंद, शशिकांत यादव, फातमा नसरीन, प्रीति कुमारी, शमा प्रवीण, अमरेंद्र कुमार समेत अन्य विधार्थियों ने भी सेमिनार में विचार रखे। सेमिनार में पूर्व परीक्षा नियंत्रक प्रो. कुलानंद यादव, राजनीति शास्त्र विभागाध्यक्ष रविंद्र कुमार चौधरी, फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा, राजकुमार गणेशन, अनिल कुमार सिंह समेत दर्जनों छात्र मौजूद थे।








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