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मार्च, 13, 2026
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सस्ते दामों वाली कार, महंगी क्यों होती है? जानिए ऑन-रोड कीमत का पूरा खेल

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सस्ते दामों वाली कार, महंगी क्यों होती है? जानिए ऑन-रोड कीमत का पूरा खेल

नई दिल्ली: आप जब किसी नई कार का सपना देखते हैं, तो शोरूम में दिखाई गई कीमत और घर लाने पर चुकाई गई कीमत में जमीन-आसमान का अंतर देखकर चौंक जाते होंगे। क्या आपने कभी सोचा है कि 7 लाख रुपये की गाड़ी आखिर 10 लाख तक कैसे पहुंच जाती है? इसकी वजह सिर्फ टैक्स नहीं, बल्कि कुछ ऐसे ‘छिपे हुए’ खेल भी हैं जो आपकी जेब पर भारी पड़ते हैं।

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एक्स-शोरूम कीमत बनाम ऑन-रोड कीमत: समझें पूरा गणित

अक्सर डीलरशिप पर आपको किसी भी गाड़ी की जो शुरुआती कीमत बताई जाती है, वह उसकी एक्स-शोरूम कीमत होती है। यह कीमत बिना किसी अतिरिक्त शुल्क, रजिस्ट्रेशन, बीमा या रोड टैक्स के होती है। लेकिन जब आप कार खरीदने का मन बनाते हैं और डीलर आपको अंतिम बिल थमाता है, तो यह आंकड़ा कई लाख रुपये ज्यादा होता है। इस बड़े अंतर को समझने के लिए ऑन-रोड कीमत के घटकों को जानना जरूरी है, जिसमें न केवल सरकारी शुल्क शामिल होते हैं बल्कि डीलरशिप द्वारा जोड़े गए कुछ वैकल्पिक या अनिवार्य लगने वाले खर्च भी शामिल होते हैं।

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एक आम ग्राहक के तौर पर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि 7 लाख की कीमत वाली कार आखिरकार 10 लाख या उससे अधिक में क्यों मिल रही है। इस अतिरिक्त लागत का एक बड़ा हिस्सा रजिस्ट्रेशन फीस, रोड टैक्स और अनिवार्य बीमा प्रीमियम में जाता है। हालांकि, इन सब के अलावा कुछ ऐसे खर्च भी होते हैं जो सीधे तौर पर कार की एक्सेसरीज से जुड़े होते हैं और डीलरशिप अक्सर इन्हें ‘जरूरी’ बताकर बेचती है, जिससे गाड़ी की कुल कीमत काफी बढ़ जाती है।

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एक्सेसरीज का खेल: कैसे बढ़ती है गाड़ी की कीमत?

गाड़ी की अंतिम कीमत में 2 से 3 लाख रुपये का अंतर लाने में एक्सेसरीज की बड़ी भूमिका होती है। डीलरशिप अक्सर ग्राहकों को कई तरह की एक्सेसरीज पैकेज खरीदने के लिए प्रेरित करती हैं, जो उन्हें लगता है कि उनकी नई गाड़ी के लिए बेहद आवश्यक हैं। इनमें साधारण फ्लोर मैट से लेकर उच्च-तकनीकी सुरक्षा उपकरण तक शामिल होते हैं। ये एक्सेसरीज कई बार इतने महंगे होते हैं कि वे गाड़ी की मूल लागत में एक महत्वपूर्ण प्रतिशत जोड़ देते हैं, जिससे ग्राहक को महसूस भी नहीं होता कि उसकी गाड़ी इतनी महंगी क्यों हो गई है।

इन एक्सेसरीज की खासियत यह होती है कि ये सीधे तौर पर गाड़ी के निर्माण का हिस्सा नहीं होते, बल्कि बाद में डीलर द्वारा इंस्टॉल किए जाते हैं। कुछ एक्सेसरीज तो ग्राहक के लिए उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन कई सिर्फ दिखावे या ‘सुविधा’ के नाम पर बेची जाती हैं जिनकी वास्तविक लागत बहुत कम होती है लेकिन डीलरशिप इन्हें भारी मुनाफे पर बेचती है। यही कारण है कि एक ही मॉडल की दो गाड़ियों की अंतिम कीमत में सिर्फ एक्सेसरीज के चुनाव के कारण हजारों से लेकर लाखों का अंतर आ सकता है।

महंगी एक्सेसरीज: अलॉय व्हील्स से लेकर सेंसर्स तक

आइए उन विशिष्ट एक्सेसरीज पर गौर करें जो कार की कीमत में बड़ा उछाल लाती हैं। इनमें सबसे प्रमुख हैं अलॉय व्हील्स। स्टॉक व्हील्स की जगह स्टाइलिश अलॉय व्हील्स लगवाने पर हजारों नहीं, बल्कि लाखों रुपये का अतिरिक्त खर्च आ सकता है। कई ग्राहक गाड़ी को प्रीमियम लुक देने के लिए इन पर पैसा खर्च करते हैं, लेकिन यह उनकी जेब पर भारी पड़ता है।

इसके अलावा, पार्किंग सेंसर्स और बैक कैमरा जैसे उपकरण भी कीमत को काफी बढ़ा देते हैं। जबकि कुछ मॉडल्स में ये मानक फीचर के तौर पर आते हैं, वहीं निचले वेरिएंट्स में इन्हें एक्सेसरीज के तौर पर जोड़ा जाता है। इसी तरह, सीट कवर, म्यूजिक सिस्टम अपग्रेड, बॉडी किट, क्रोम एक्सेसरीज और नेविगेशन सिस्टम जैसी चीजें भी गाड़ी की कुल कीमत में 50,000 रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक का इजाफा कर सकती हैं। ये सभी अतिरिक्त चीजें ग्राहकों को लुभाने के लिए पेश की जाती हैं, लेकिन अंततः वे गाड़ी को उसकी मूल कीमत से कहीं ज्यादा महंगा बना देती हैं।

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समझदारी से करें कार की खरीद: बचत के तरीके

एक समझदार खरीदार के रूप में, आपको डीलरशिप द्वारा पेश की जाने वाली हर एक्सेसरी को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करना चाहिए। सबसे पहले, यह पता करें कि कौन सी एक्सेसरीज वास्तव में आपकी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण हैं और कौन सी केवल दिखावे के लिए हैं। उदाहरण के लिए, बैक कैमरा और पार्किंग सेंसर्स सुरक्षा के लिहाज से उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन फैंसी अलॉय व्हील्स या क्रोम एक्सेसरीज अक्सर सिर्फ सौंदर्य के लिए होती हैं।

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आप अपनी पसंद की कई एक्सेसरीज बाहर से भी कम कीमत पर लगवा सकते हैं, बशर्ते यह आपकी गाड़ी की वारंटी को प्रभावित न करे। डीलरशिप पर मिलने वाले पैकेजेस के बजाय, अलग-अलग एक्सेसरीज की कीमत पूछें और मोलभाव करने से न डरें। बीमा और फाइनेंस के विकल्पों की तुलना भी बाहरी स्रोतों से करें, क्योंकि डीलरशिप अक्सर अपने पसंदीदा प्रदाताओं से महंगे विकल्प पेश करती है। थोड़ी रिसर्च और समझदारी से आप अपनी पसंदीदा कार को वाजिब दाम पर घर ला सकते हैं और अनावश्यक खर्चों से बच सकते हैं।

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