
आवेश आलम अररिया। Mid Day Meal Scheme: जिस घोड़े पर उम्मीदों का दांव लगाया था, वो रेस के बीच में ही थककर बैठ गया। कुछ ऐसा ही हाल अररिया जिले के कुर्साकांटा प्रखंड में मध्याह्न भोजन योजना के पायलट प्रोजेक्ट का हुआ है, जिसे अब समाप्त करने का फैसला लिया गया है। शिक्षा विभाग के इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के असफल होने के बाद 1 फरवरी से एक बार फिर पुरानी व्यवस्था के तहत ही स्कूलों में बच्चों के लिए भोजन पकाया जाएगा।
जानकारी के अनुसार, पिछले साल बड़े बदलावों और सुधारों के वादे के साथ इस पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य मध्याह्न भोजन के संचालन को शिक्षकों के काम से अलग करना और इसे एक केंद्रीकृत व्यवस्था के तहत लाना था। लेकिन एक आंतरिक जांच में यह बात सामने आई कि लगभग 70 प्रतिशत स्कूलों के प्रधानाध्यापक अभी भी सीधे तौर पर एमडीएम के संचालन में शामिल थे। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह आंकड़ा उस उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत था, जिसके लिए यह प्रोजेक्ट शुरू किया गया था। इसी रिपोर्ट के आधार पर विभाग ने प्रोजेक्ट को तत्काल प्रभाव से बंद करने का निर्णय लिया है।
क्यों फेल हुई Mid Day Meal Scheme की नई व्यवस्था?
विभागीय सूत्रों की मानें तो पायलट प्रोजेक्ट का लक्ष्य भोजन की गुणवत्ता में सुधार करना, शिक्षकों पर से अतिरिक्त बोझ कम करना और पूरी पोषाहार योजना में पारदर्शिता लाना था। इसके तहत एक केंद्रीयकृत एजेंसी या समूह को भोजन बनाने और स्कूलों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी जानी थी। लेकिन जमीनी स्तर पर यह व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो सकी। कई स्कूलों में प्रधानाध्यापकों ने पुरानी व्यवस्था को ही किसी न किसी रूप में जारी रखा, जिससे प्रोजेक्ट की मूल भावना ही समाप्त हो गई।
इस मामले ने एक बार फिर व्यवस्था में मौजूद खामियों को उजागर कर दिया है। सवाल यह उठता है कि जब एक नई प्रणाली लागू की गई थी, तो 70% प्रधानाध्यापक इसमें हस्तक्षेप करने में कैसे सफल रहे। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। यह पूरी निगरानी प्रणाली पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। पुरानी व्यवस्था की वापसी को कई लोग एक कदम पीछे हटने के तौर पर देख रहे हैं।
अब आगे क्या होगी विभाग की रणनीति?
पायलट प्रोजेक्ट के इस तरह अचानक बंद होने से शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। अब विभाग के सामने यह चुनौती है कि पुरानी व्यवस्था में उन खामियों को कैसे दूर किया जाए, जिनके कारण ही नए प्रोजेक्ट की जरूरत महसूस हुई थी। विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता और पौष्टिकता से कोई समझौता न हो।
फिलहाल, 1 फरवरी से सभी संबंधित स्कूलों को पुरानी व्यवस्था के अनुसार ही मध्याह्न भोजन का संचालन करने का निर्देश दे दिया गया है। देखना यह होगा कि क्या विभाग इस असफलता से सबक लेकर भविष्य में कोई और बेहतर योजना लेकर आता है, या फिर पुरानी व्यवस्था ही स्थायी रूप ले लेगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह मामला सिर्फ अररिया तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य में चल रही कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए एक केस स्टडी बन गया है।







