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Bhagalpur News: डर मरा, पहाड़ जिंदा हो उठा, टूटी चुप्पी! @ Deshaj Times Special Ep. 18 @ कब मिलेगी बाबा Tilka Manjhi की आत्मा को शांति?

तुमने समझा था कि फंदे पे लटका कर उसे मार दिया, मगर उसकी शहादत तो मिट्टी में खाद बन के उतर गई। सत्तर बरस तक जिस पहाड़ ने घुट-घुट कर ज़हर पिया, वही आख़िरकार एक दिन 'हूल' का सैलाब बन के उभर गई।यह दास्तां महज़ सत्तर सालों के फ़ासले की नहीं है, बल्कि उस ख़ौफ़नाक दौर का मरसिया (शोकगीत) है जब सत्ता ने सोचा था कि बग़ावत के आदि-गुरु को फांसी देकर वे आने वाली नसल की ज़ुबान पर हमेशा के लिए ताला लगा देंगे। 13 जनवरी 1785 को भागलपुर के जिस बूढ़े बरगद पर बाबा तिलका मांझी की सांसें थमी थीं, अंग्रेज़ों ने वहाँ पुलिस चौकी बना दी ताकि हर राहगीर डरे, हर बच्चा ख़ौफ़ में जिए और माएं बच्चों को लोरी में 'हूल' का नाम सुनाना भूल जाएं।

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दो पीढ़ियां मिट्टी में मिल गईं, मांदर की खाल फट गई मगर थाप नहीं निकली। ‘दामिन-ए-कोह’ के नाम पर जंगल कटते रहे, पहाड़ियों को बेदख़ल किया जाता रहा और हुकूमत का कोड़ा हर पीठ पर ज़ुल्म की इबारत लिखता रहा। अंग्रेज़ों के बहीखातों में लिखा गया कि ‘बग़ावत दफ़्न हो चुकी है।’ मगर साम्राज्यवादी यह भूल गए कि शहीद कभी मरते नहीं; वे मिट्टी में मिलकर वह बारूद बनते हैं जिसे एक दिन फटना ही होता है।

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सत्तर साल तक एक पूरी कौम की जुबां सिल दी गई थी। सत्तर साल तक मां ने बच्चे को लोरी में ‘तिलका’ का नाम नहीं सुनाया। सत्तर साल तक बरगद का वो फंदा हर राहगीर को घूरता रहा—डराता रहा।

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70 Years of Silence: From Tilka Manjhi’s Hanging to the Santhal Hul
70 Years of Silence: From Tilka Manjhi’s Hanging to the Santhal Hul

फिर एक सुबह ऐसी आई जब डर मर गया और पहाड़ जिंदा हो गया30 हजार तीर एक साथ आसमान में उठे। कलकत्ता का गवर्नर हाउस थर्रा गया।

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अंग्रेजों ने लिखा—”We thought they were dead.”

वो गलत थे। शहीद मरते नहीं, खाद बनते हैं

और खाद से बगावत उगती है।

13 जनवरी 1785 को फांसी के उस फंदे से 30 जून 1855 के हूल तक—

ये सिर्फ 70 साल की कहानी नहीं है। ये हर उस दौर की कहानी है जब सत्ता सोचती है कि डरा कर आवाज को दफना देगी।

पढ़िए। क्योंकि 2026 में भी सवाल वही है—

क्लीवलैंड मर गया, क्लीवलैंडगीरी जिंदा क्यों है?

और आपकी खामोशी कितने साल की होगी?

70 Years of Silence: From Tilka Manjhi’s Hanging to the Santhal Hul
70 Years of Silence: From Tilka Manjhi’s Hanging to the Santhal Hul

तारीख आई—30 जून 1855। सत्तर साल के सब्र का बांध ऐसा टूटा कि कलकत्ता का गवर्नर हाउस थर्रा गया। सिदो-कान्हू, चांद और भैरव की एक हुंकार पर तीस हज़ार से ज़्यादा संथाल अपनी कुल्हाड़ी, फरसा और पारंपरिक तीर-धनुष लेकर उठ खड़े हुए। दिकू महाजनों का शोषण, जबरन लगान और रेलवे के नाम पर होती बेदख़ली के ख़िलाफ़ हर घर से एक तिलका पैदा हो गया। अंग्रेज़ों ने हैरान होकर अपने गजेटियर में लिखा—

“हम तो समझे थे कि वे मर चुके हैं।”

आज साल 2026 है। तिलका का तीर और सिदो का भाला भले ही शांत हो, मगर सवाल आज भी अपनी जगह जस का तस खड़ा है—“क्लीवलैंड मर गया, पर क्लीवलैंडगीरी ज़िंदा क्यों है?” तब लोग संगीनों के डर से ख़ामोश थे, आज लोग तरक्क़ी, प्रमोशन और लालच की ‘सुविधा’ से चुप हैं। आइए, देशज टाइम्स की इस विशेष ऐतिहासिक श्रृंखला के ज़रिए उस खामोशी की क़ीमत और हूल के जज़्बे को समझते हैं, जो साफ़ कहती है कि ख़ामोशी की क़ीमत हमेशा आने वाली पीढ़ी को चुकानी पड़ती है

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फांसी के बाद की खामोशी…सत्तर साल तक सिसकता पहाड़, फिर फूटा हूल का ज्वार…13 जनवरी 1785 से 30 जून 1855 तक—दहशत, दमन और चिंगारी का महाविस्फोट।

13 जनवरी 1785: जब बरगद रोया, और धरती ने सांस रोक ली

भागलपुर का वही बरगद। जिसकी जड़ें गंगा की मिट्टी में नहीं, धरती की नसों में धंसी थीं। जिसकी डालें आसमान को नहीं, इतिहास को छूती थीं। उसी बरगद से 13 जनवरी 1785 को अंग्रेजों ने तिलका मांझी को लटका दिया

70 Years of Silence: From Tilka Manjhi’s Hanging to the Santhal Hul
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फंदा गले में कसा। कंपनी के सिपाही ठहाका लगा रहे थे। पर तिलका बाबा की आँखें खुली थीं। पथराई नहीं थीं। पहाड़ की तरफ देख रही थीं। उस पहाड़ की तरफ जहां झिनो सोई थी। जैसे अपनी ‘खाम-खुंटी’—जल-जंगल-जमीन—को सौंप रहे हों अगली पीढ़ी को। आँखों में एक ही संदेश था:

“मैं जा रहा हूँ, पर जिद छोड़कर जा रहा हूँ।”

फांसी के साथ ही ग्रामीणों की जुबां पर ताला लग गया। ताला ऐसा कि चाबी भी गुम हो गई।

क्लीवलैंड का खून सूख चुका था, पर कंपनी का खौफ जवान था। जिसने ‘हूल’ शब्द कहा, उसकी झोपड़ी में आग लगा दी गई। जिसने तिलका का नाम लिया, उसके बच्चों की कलाइयों में बेगारी की बेड़ी डाल दी गई। पहाड़िया, संथाल, मांझी—सबकी बोली पर कंपनी का पहरा बैठ गया।

मांडर की खाल फट गई, पर थाप नहीं निकली। तीर-धनुष को दीवारों पर टांग दिया गया, जैसे शहीद की तस्वीर टांगते हैं। महुआ के पेड़ तले अब कोई नहीं नाचता था। पत्ते भी डर-डरकर सरसराते थे। झिनो का इंतजार अब सिर्फ हवा की सिसकी में बचा था।

70 साल की सियाह खामोशी — 1785 से 1855

सत्तर साल… पूरा सात दशक।

70 Years of Silence: From Tilka Manjhi’s Hanging to the Santhal Hul
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दो पीढ़ियां मिट्टी हो गईं। दादा ने पोते के कान में तिलका की कहानी नहीं फूंकी। फूंकता तो लाल मुंह वाले सिपाही उठा ले जाते। माएं बच्चों को लोरी में ‘हूल’ नहीं सुनाती थीं। सुनातीं तो साहब का लगान दोगुना हो जाता। अनाज की जगह बच्चों को गिरवी रखना पड़ता।

जंगल कटते रहे। कुल्हाड़ी दिन-रात चलती रही। ‘दामिन-ए-कोह’ के नाम पर पहाड़ियों को उनकी ही जमीन से खदेड़ा जाता रहा। कंपनी का कानून पत्थर की लकीर था:

“जो बोलेगा, सो मरेगा। जो सिर उठाएगा, सो कटेगा। जो तिलका का नाम लेगा, उसकी सात पुश्तें गुलाम रहेंगी।”

भागलपुर में तिलका मांझी चौक पर, उस कलेजा चीरने वाले बरगद के नीचे—जहां बाबा की सांस टूटी थी—अंग्रेजों ने पुलिस चौकी बना दी। संगीनें तान दीं। ताकि हर राहगीर देखे। हर बच्चा देखे। डरे। और अपनी मां के पेट से ही खामोश पैदा हो।

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स्कूल नहीं थे, पर डर की पढ़ाई हर आंगन में होती थी। मास्टर साहब नहीं थे, पर कोड़े का सायब हर पीठ पर निशान छोड़ता था। किताब नहीं थी, पर जुल्म की इबारत हर माथे पर लिखी थी।

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तिलका बाबा का नाम जुबां पर लाना ‘बगावत’ था। और बगावत की सजा सिर्फ फांसी नहीं थी। बगावत की सजा थी—भूख, बेगारी, बेइज्जती और सात पुश्तों की गुलामी

30 जून 1855: जब सत्तर साल का बांध टूटा और पहाड़ गरजा

फिर तारीख आई—30 जून 1855

सत्तर साल की खामोशी, दहशत, जुल्म, बेइज्जती—सबका बांध एक साथ टूट गया। धरती कांपी नहीं, अंग्रेजी राज कांप गया

सिदो उठे। कान्हू उठे। चांद उठे। भैरव उठे

भागलपुर से सटे संथाल परगना में ‘हूल’ का नगाड़ा ऐसा बजा कि कलकत्ता तक थर्रा गया।

इस बार मैदान में एक तिलका नहीं था। इस बार हर घर से तिलका निकला था।

30 हजार से ज्यादा संथाल—तीर-धनुष, कुल्हाड़ी, फरसा, भाला लेकर। औरतें, बूढ़े, बच्चे—सब। क्योंकि जुल्म जब हद से गुजर जाए, तो चूल्हा-चौका भी हथियार बन जाता है।

क्यों टूटी चुप्पी? क्योंकि जुल्म की भी एक मियाद होती है। क्योंकि धरती भी कब तक जहर पीती?

70 Years of Silence: From Tilka Manjhi’s Hanging to the Santhal Hul
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  • लगान—इतना बढ़ा कि खेत बिक गए, फिर बैल बिक गए, फिर अनाज की जगह बच्चे गिरवी रखने की नौबत आ गई।

  • महाजन और दिकू—अंग्रेजों की शह पर आदिवासियों की जमीन, बहू-बेटी की इज्जत, सब लूट रहे थे। पंचायत खत्म, साहब का कचहरी शुरू।

  • रेल और सड़क—साहब की रेल के लिए जंगल काटे जा रहे थे। और कुली बनाने के लिए गांव के गांव उजाड़े जा रहे थे। जवान लड़कों को रस्सी से बांधकर ले जाते थे।

सत्तर साल पहले तिलका ने तीर उठाया था एक क्लीवलैंड के लिए। 1855 में सिदो-कान्हू ने तीर उठाया पूरे ‘कंपनी राज’ के लिए

नारा वही था जो तिलका के खून से बरगद की जड़ में लिखा गया था: वही ‘खाम-खुंटी’ का नारा। वही जल-जंगल-जमीन का नारा

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अंग्रेज हक्के-बक्के रह गए। गजेटियर में लिखा—”We thought they were dead.” सत्तर साल तक जिन्हें मरा हुआ समझा, कब्र में दफन समझा, वो जिंदा थे। और सिर्फ जिंदा नहीं, दहकती आग बन चुके थे

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तिलका से सिदो तक: एक चिंगारी, दो सदी, एक ही ज्वाला

इतिहास चीख-चीखकर गवाही देता है—शहीद को फांसी दे सकते हो, उसकी सोच को फांसी नहीं दे सकते

1785 में तिलका को लटकाकर अंग्रेजों ने एलान किया था: ‘आतंक खत्म, विद्रोह खत्म’। 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू ने जवाब दिया: ‘आतंक नहीं, आग बोई थी तुमने। अब फसल काट लो’।

तिलका पहले गुरु थे। अकेले लड़े। राह दिखाई। शहीद हुए। उनकी शहादत सत्तर साल तक खाद बनी। उस खाद, उस खून, उस फांसी के फंदे से 1855 का ‘संथाल हूल’ उगा। और संथाल हूल की कोख से 1857 का गदर पैदा हुआ।

यही रिश्ता है तिलका और आजादी का

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यही फर्क है तीर और कलम में, शहादत और खामोशी में। तीर से एक क्लीवलैंड मरता है। शहादत से सोच पैदा होती है, और सोच से हजार क्लीवलैंड पैदा होने से रुक जाते हैं।

आज 2026 है। तिलका को फांसी दिए 241 साल हो गए। सिदो-कान्हू के हूल को 171 साल हो गए। पर सवाल जस का तस खड़ा है—क्लीवलैंड मर गया, क्लीवलैंडगीरी जिंदा क्यों है?

1845 तक लोग डर से चुप थे। संगीन के डर से। 2026 में लोग ‘सुविधा’ से चुप हैं। प्रमोशन के डर से। ट्रांसफर के डर से। लाइक-व्युज के लालच से। फर्क सिर्फ डर की शक्ल का है, डर का नहीं।

आखिरी बात: खामोशी की कीमत और हूल की कीमत

70 साल की खामोशी ने क्या दिया?

और जुल्म दिया। और लगान दिया। और बेगारी दी। और गुलामी दी। दो पीढ़ियां घुट-घुटकर मर गईं।

चुप्पी टूटी तो क्या मिला? ‘संथाल परगना’ नाम का जिला मिला। एक पहचान मिळाली। ‘दामिन-ए-कोह’ पर हक मिला। दुनिया ने सुना कि कोई कौम जिंदा है।

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इसलिए देशज टाइम्स का फरमान है—

जब-जब जुल्म होगा, तिलका पैदा होगा। जब-जब ‘खाम-खुंटी’ छिनेगी, हूल फूटेगा।

और जब-जब कलम बिकेगी, अखबार मरेगा। जब-जब सवाल मरेगा, लोकतंत्र मरेगा।

70 साल की खामोशी बहुत होती है

इतिहास का सबक खून से लिखा है—खामोशी की कीमत अगली पीढ़ी चुकाती है। अपने बच्चों से, उनके भविष्य से। बोलने की कीमत सिर्फ हम चुकाते हैं। अपनी नौकरी से, अपने चैन से

चुनना तुम्हें है—70 साल की गुलामी या एक दिन की बगावत? 9 साल का घोटाला या एक सवाल का हूल?

“हूल जोहार! उलगुलान जिंदाबाद! बाबा तिलका मांझी, खाम खुंटी काना हो!”

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