
Mahatma Gandhi: जैसे स्याही के बिना कलम अधूरी है, वैसे ही बापू के विचारों के बिना भारत की कल्पना अधूरी लगती है। भागलपुर में राष्ट्रपिता की पुण्यतिथि पर आयोजित एक कार्यक्रम में कुछ ऐसे ही विचार उभरकर सामने आए, जहां वक्ताओं ने एक सुर में कहा कि गांधी आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने कल थे। भागलपुर स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र की ओर से महात्मा गांधी के शहादत दिवस के अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। प्रकाश चंद्र गुप्ता की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में सर्वधर्म प्रार्थना, पुष्पांजलि और श्रद्धांजलि सभा का आयोजन हुआ, जिसमें समाज के हर वर्ग के लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम में विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने धर्मग्रंथों के सार को साझा करते हुए सर्वधर्म समभाव की भावना पर प्रकाश डाला। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
Mahatma Gandhi के शहादत दिवस पर जुटे प्रबुद्धजन
इस कार्यक्रम में बौद्धिक जगत की कई बड़ी हस्तियों ने शिरकत की। मुख्य अतिथि के तौर पर छपरा जेपी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. फारूक अली मौजूद रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में अंतर्राष्ट्रीय गांधी हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति डॉ. मनोज कुमार और वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम की मुख्य वक्ता साहित्यकार एवं गांधी विचारक डॉक्टर सुजाता चौधरी थीं।
‘मजबूरी नहीं, मजबूती का नाम हैं महात्मा गांधी’
पुष्पांजलि अर्पित किए जाने के बाद प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने ऑनलाइन माध्यम से सभा को संबोधित किया। उन्होंने इस आम धारणा का खंडन किया कि ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी है’। उन्होंने कहा, “गांधी मजबूरी के प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, निर्भयता, सम्मान और प्रतिकार की प्रतिमूर्ति थे। इसे यूं कहना चाहिए कि मजबूरी नहीं, मजबूती का नाम Mahatma Gandhi है।” उनका यह कथन आज के युवाओं के लिए एक नई दिशा प्रदान करता है।

मुख्य वक्ता डॉक्टर सुजाता चौधरी ने अपने संबोधन में कहा कि आज के दौर में जब समाज में नफरत फैलाई जा रही है और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के प्रयास हो रहे हैं, तब गांधी अत्यधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उन्होंने कहा कि हिंसा और डर के माहौल में गांधी का अहिंसा का मार्ग ही हमें बचा सकता है। उन्होंने इस दिवस को केवल शहादत दिवस नहीं, बल्कि ‘संकल्प दिवस’ के रूप में मनाने का आह्वान किया। उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाला समय गांधी विचार का होगा और पूरी दुनिया को गांधी दर्शन ही राह दिखाएगा।
नफरत के दौर में गांधी दर्शन ही एकमात्र रास्ता
डॉ. सुजाता ने इस बात पर भी जोर दिया कि गांधी ने आम लोगों, विशेषकर महिलाओं को जो सम्मान दिया, वह स्मरणीय है। उन्होंने कहा कि हम छोटी-छोटी बातों का विरोध करने से डरते हैं, लेकिन गांधी ने एक ऐसे साम्राज्य से सीधी टक्कर ली जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था। उन्होंने सत्य और अहिंसा के बल पर उस साम्राज्य की नींव हिला दी। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।विशिष्ट अतिथि डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं जो हमारे दैनिक और व्यक्तिगत जीवन से लेकर दुनिया के तमाम बड़े मसलों का हल प्रस्तुत करते हैं। उनका गांधी विचार हमें हर मुश्किल से निकलने का रास्ता दिखाता है।
गांधी का जीवन ही दुनिया के लिए संदेश
मुख्य अतिथि डॉ. फारूक अली ने स्वतंत्रता आंदोलन में गांधी जी के क्रमबद्ध आंदोलनों का जिक्र किया। उन्होंने चंपारण सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक के सफर को याद करते हुए कहा कि ‘करेंगे या मरेंगे’ का नारा देने के बाद और कुछ कहना शेष नहीं रह जाता। उन्होंने उस प्रसिद्ध उक्ति का उल्लेख करते हुए कहा, “आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस का ऐसा कोई पुतला भी इस धरती पर चला था।”कार्यक्रम में समाजसेवी रामचरण ने कहा कि गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम भारतीय संविधान की प्रस्तावना के अनुरूप समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचा सकें। इस अवसर पर उज्जैन कुमार मालू, मोहम्मद फारूक आजम, अरविंद कुमार राम और सोहन दास जीनी हमीदी समेत कई अन्य लोगों ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का सफल संचालन संजय कुमार ने किया और धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर सुनील अग्रवाल द्वारा किया गया। इस मौके पर शहर के कई गणमान्य नागरिक और मारवाड़ी कन्या पाठशाला की छात्राएं बड़ी संख्या में उपस्थित रहीं।




