
भागलपुर न्यूज़: स्कूल की घंटी बजते ही क्लासरूम में बच्चों का शोर गूंजता है, लेकिन इस शोर पर हर पल एक खामोश खतरा मंडराता रहता है. सोचिए उन बच्चों और शिक्षकों का, जो हर दिन मौत के साये में स्कूल आते हैं, जहां ऊपर से गुजरता हाई टेंशन तार सिर्फ बिजली नहीं, बल्कि साक्षात खतरा ढो रहा है.
बिहार के भागलपुर जिले से एक ऐसी ही चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां एक सरकारी विद्यालय भवन के ठीक ऊपर से 11,000 वोल्ट की हाई टेंशन लाइन गुजर रही है. यह खतरनाक तार स्कूल में पढ़ने वाले सैकड़ों बच्चों और टीचिंग स्टाफ के लिए किसी टाइम बम से कम नहीं है. हर दिन बच्चे इसी तार के नीचे खेलते हैं, प्रार्थना करते हैं और अपनी कक्षाएं लगाते हैं. उन्हें शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं कि उनके सिर के ऊपर कितना बड़ा खतरा मंडरा रहा है.
कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
यह हाई टेंशन लाइन स्कूल परिसर के लिए एक स्थायी खतरा बन चुकी है. हल्की सी लापरवाही या मौसम का बिगड़ा मिजाज एक भयानक हादसे को न्योता दे सकता है. विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह की लाइनें सुरक्षा मानकों का खुला उल्लंघन हैं, खासकर जब यह किसी स्कूल जैसी संवेदनशील जगह के ऊपर से गुजर रही हो. स्कूल प्रबंधन और स्थानीय लोग इस स्थिति को लेकर बेहद चिंतित हैं.
इस हाई टेंशन तार से होने वाले संभावित खतरे किसी से छिपे नहीं हैं:
- तार टूटने का डर: आंधी, तूफान या किसी अन्य कारण से अगर यह तार टूटकर नीचे गिरता है, तो यह भयावह हो सकता है.
- बारिश में करंट का खतरा: बरसात के मौसम में करंट फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जिससे पूरी स्कूल बिल्डिंग प्रभावित हो सकती है.
- बच्चों की सुरक्षा: बच्चे खेलकूद के दौरान अक्सर छत पर चले जाते हैं या पतंग उड़ाते हैं. ऐसी स्थिति में उनका तार की चपेट में आने का खतरा बना रहता है.
अभिभावकों और शिक्षकों की बढ़ी चिंता
बच्चों को स्कूल भेजकर अभिभावक निश्चिंत रहना चाहते हैं, लेकिन यहां स्थिति बिल्कुल उलट है. जब तक बच्चे स्कूल से घर वापस नहीं आ जाते, तब तक माता-पिता की सांसें अटकी रहती हैं. उनका कहना है कि वे अपने बच्चों को शिक्षा के मंदिर में ज्ञान अर्जित करने भेजते हैं, मौत के मुंह में नहीं. वहीं, स्कूल के शिक्षक भी इस गंभीर समस्या से परेशान हैं. वे बच्चों को तार के नीचे खेलने से रोकते हैं, लेकिन हर बच्चे पर हर समय नजर रखना संभव नहीं है.
क्या किसी अनहोनी का इंतज़ार कर रहा प्रशासन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि शिक्षा विभाग और बिजली विभाग की नजर इस गंभीर लापरवाही पर अब तक क्यों नहीं पड़ी? स्कूल प्रबंधन द्वारा कई बार संबंधित अधिकारियों को इस समस्या से अवगत कराने की कोशिश की गई, लेकिन नतीजा सिफर रहा. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी के इंतजार में है. यह स्थिति न केवल बच्चों के जीवन के अधिकार का हनन है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता का एक बड़ा उदाहरण भी है. अब देखना यह है कि खबरें सामने आने के बाद क्या संबंधित विभाग अपनी कुंभकर्णी नींद से जागता है या नहीं.







