spot_img

Bhagalpur News: 1 सवाल, 4 हथियार, ‘ राज किसका ‘ – अब तीर बोलेगा! | Deshaj Times Special Ep. 14 | कब मिलेगी बाबा Tilka Manjhi की आत्मा को शांति?

कहाँ कागज़ के टुकड़ों से बदलती है कभी दुनिया, हुकूमत को झुकाने के लिए 'हथियार' बोलते हैं। तुम अकाल के बहीखाते लिखो या टैक्स के रजिस्टर, जहाँ लहू गिरा हो माटी का, वहाँ कोहसार बोलते हैं।यह महज़ तारीखों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की रगों में उबलते उस लहू का महाकाव्य है जिसे इतिहासकार अक्सर किस्तों में बयाँ करते हैं। सन् 1824 में जब बिशप रेजिनाल्ड हीबर अपनी डायरी में राजमहल की पहाड़ियों का ख़ौफ़ और शौर्य दर्ज कर रहे थे, तो वे दरअसल ब्रिटिश साम्राज्य की उस कमज़ोर नब्ज़ को छू रहे थे, जिसे सबसे पहले बाबा तिलका मांझी के तीर ने बेध डाला था।

spot_img
- Advertisement -

तिहास गवाह है कि आजादी की जंग सिर्फ लॉर्ड्स की मेजों या आंदोलनों के मंचों से नहीं तय हुई; इसकी मजबूत बुनियाद जंगल की उन कंदराओं में रखी गई थी जहां बगावत की चिंगारी बारूद से पहले सुलग चुकी थी। यह एक ऐसा सफरनामा है जिसमें हथियारों की जबान बदलती रही, मगर हुकूमत से पूछा जाने वाला सवाल कभी नहीं बदला।

- Advertisement -
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story

तिलका मांझी के शव को घोड़े की पूंछ से बांधकर घसीटने वाली बर्बर हुकूमत ने सोचा था कि वे बगावत का सबक सिखा रहे हैं, मगर वे भूल गए थे कि माटी में बोया गया शहादत का बीज हमेशा एक नई फसल बनकर उगता है। आइए, देशज टाइम्स की इस विशेष रिपोर्ट के जरिए इतिहास के उस पन्ने को पलटते हैं जहां 160 सालों तक सिर्फ एक ही सवाल गूंजता रहा—“राज किसका?” और जिसका आखिरी जवाब 15 अगस्त 1947 को इस देश की आहत मगर खुद्दार अवाम ने अपने खून से लिखा।

- Advertisement -

हीबर की डायरी से लेकर संथाल हूल तक – सशस्त्र विद्रोहों का वो इतिहास जो आज भी बोलता है…भागलपुर। इतिहास सिर्फ किताबों में नहीं, धरती की धूल में भी लिखा होता है। राजमहल की पहाड़ियां इसका गवाह हैं। 1824 में जब कलकत्ता के बिशप रेजिनाल्ड हीबर घोड़े पर सवार होकर इन पहाड़ियों से गुजरे, तो उन्होंने अपनी डायरी में लिखा –

“ये वो धरती है जहां आदिवासी ने अंग्रेज की सत्ता को पहली बार चुनौती दी थी।”

- Advertisement -

उनका इशारा था तिलका मांझी की तरफ।

bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story

हीबर की “नैरेटिव ऑफ अ जर्नी थ्रू द अपर प्रोविंसेस ऑफ इंडिया” आज 200 साल पुराना दस्तावेज है। इसमें वो तस्वीर है जो ब्रिटिश सरकारी फाइलों में नहीं मिलती – अकाल, लगान, महाजनी और आदिवासी गुस्सा

Tilka Manjhi: पहला सशस्त्र विद्रोही

1784 में तिलका मांझी ने भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड पर तीर से हमला किया। क्लीवलैंड को “चिलमिल साहेब” कहा जाता था क्योंकि उन्होंने संथालों को जंगल काटकर खेती करने की इजाजत दी थी। लेकिन 1770 के बंगाल अकाल और कंपनी की सख्त टैक्स नीति ने धैर्य तोड़ दिया।

लोककथाओं के मुताबिक तिलका ने कंपनी के खजाने और महाजनों के गोदाम लूटकर अनाज, बीज और मवेशी भूखे गांवों में बांट दिए। 1785 में उन्हें भागलपुर के बरगद पेड़ से लटका दिया गया। उनका शव घोड़े की पूंछ से बांधकर घसीटा गया।

bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story

हीबर ने 40 साल बाद लिखा कि क्लीवलैंड की मौत के बाद कंपनी ने नीति बदल दी। लगान बढ़ा, जमींदार-महाजन गठजोड़ मजबूत हुआ। यही आग 1855 के संथाल हूल तक पहुंची।

यह भी पढ़ें:  Bhagalpur -Banka Sand Mining News: बांका में बालू माफियाओं का दुस्साहस! खनन टीम पर हमला, पुलिसकर्मी लहूलुहान

आंकड़ों में सशस्त्र विद्रोहों का सफर

ब्रिटिश राज के 190 साल में भारत में 200 से ज्यादा बड़े-छोटे सशस्त्र विद्रोह दर्ज हैं। प्रमुख आंकड़े:

18वीं सदी

  • 1784: तिलका मांझी विद्रोह – राजमहल पहाड़ियां

  • 1799: चुआर विद्रोह – बंगाल-बिहार सीमा

  • शहीद: सैकड़ों आदिवासी, ब्रिटिश रिकॉर्ड में “डाकू” कहे गए

19वीं सदी पूर्वार्ध

  • 1817: पाइका विद्रोह, ओडिशा – 400 से ज्यादा गांव शामिल

  • 1824-26: कोल विद्रोह, छोटानागपुर – 5000 से ज्यादा कोल आदिवासी हथियारबंद

  • 1855-56: संथाल हूलसिदो-कान्हू के नेतृत्व में 50,000 संथाल। सरकारी आंकड़ों में 15,000-20,000 शहीद

info-dt
info-dt

1857 प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

  • 120 से ज्यादा सैन्य छावनियों में विद्रोह

  • दिल्ली, लखनऊ, कानपुर, झांसी, जगदीशपुर प्रमुख केंद्र

  • शहीद: सरकारी अनुमान 1 लाख से अधिक, भारतीय इतिहासकारों के मुताबिक 2-3 लाख

1857 के बाद 1947 तक

  • 1899-1900: बिरसा मुंडा का उलगुलान – 2000 से ज्यादा मुंडा शहीद

  • 1905-1931: क्रांतिकारी आंदोलनखुदीराम, भगत सिंह, आजाद, राजगुरु समेत 100 से ज्यादा फांसी

  • 1942: भारत छोड़ो आंदोलन – 1000 से ज्यादा सरकारी इमारतें, रेल लाइनें निशाना

  • 1944-45: आजाद हिंद फौज – 60,000 सैनिक, इंफाल-कोहिमा तक पहुंच

  • 1946: रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह – 78 जहाज, 20,000 नौसैनिक शामिल

साहित्य ने कैसे दर्ज किया संघर्ष

हीबर की डायरी ब्रिटिश अधिकारी की नजर है। लेकिन लोकगीत, मुंडारी कविता, संथाल “हूल गीत” और भगत सिंह की जेल डायरी ने दूसरी तरफ की आवाज दी।

देशज टाइम्स से बात करते हुए भागलपुर निवासी रजनीश सिंह कहते हैं,

“तिलका मांझी को हम अक्सर ‘भारतीय रॉबिन हुड’ कहते हैं। लेकिन हीबर की डायरी बताती है कि ये सिर्फ लूट-डकैती नहीं थी। ये 1770 के अकाल, लगान व्यवस्था और आदिवासी जमीन की लड़ाई थी। तिलका से लेकर बिरसा, और भगत सिंह से लेकर INA तक – ये एक ही धारा है।”

क्यों अहम है ये इतिहास आज

आज राजमहल में तिलका मांझी का स्मारक है। झारखंड में संथाल हूल दिवस मनाया जाता है। 1857 को “पहला स्वतंत्रता संग्राम” कहा जाता है। लेकिन हीबर की डायरी और सरकारी आंकड़े बताते हैं कि विद्रोह 1784 से शुरू हुआ था।

आंकड़े बताते हैं कि 1857 से पहले 50 से ज्यादा बड़े आदिवासी और किसान विद्रोह हुए। हर बार मुद्दा वही था – जमीन, जंगल, लगान और इज्जत

“राज किसका? -एक सवाल, चार हथियार, 160 साल का सफर

  • तिलका मांझी का तीर, संथाल का भाला, भगत सिंह की पिस्तौल और INA की जापानी बंदूक – सब एक ही सवाल पूछ रहे थे – “राज किसका?”

यह भी पढ़ें:  Bhagalpur Jalapurti News: भागलपुर को कब मिलेगा शुद्ध पानी? आठ साल बाद गंगा चैनल निर्माण को मिली रफ्तार, पर ये बड़ी चुनौती बाकी!

तिलका मांझी का तीर 1784 में भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड की तरफ चला।

संथाल का भाला 1855 में सिदो-कान्हू के नेतृत्व में महाजन और ब्रिटिश फौज की तरफ उठा।

भगत सिंह की पिस्तौल 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अफसर सॉन्डर्स पर गरजी।

INA की जापानी बंदूक 1944 में इंफाल-कोहिमा की पहाड़ियों में ब्रिटिश सेना पर तनी।

bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story

1784: तिलका मांझी का तीर – जंगल की पहली हुंकार

भागलपुर की राजमहल पहाड़ियां1770 का भयंकर अकाल बीज, बैल और अनाज सब खा गया। कंपनी ने राहत की जगह लगान बढ़ा दिया। महाजन और ठेकेदार आदिवासी जमीन हड़पने लगे।

bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story

तिलका मांझी ने तय किया कि अब तीर बोलेगा। 1784 में उन्होंने कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड पर हमला किया, जिसे संथाल “चिलमिल साहेब” कहते थे। तीर क्लीवलैंड की टांग में लगा। ये पहली बार था जब ब्रिटिश अधिकारी को आदिवासी ने सीधे निशाना बनाया

कंपनी ने तिलका को पकड़कर 1785 में भागलपुर के बरगद पर फांसी दी। शव को घोड़े की पूंछ से बांधकर घसीटा गया ताकि “बगावत का सबक” मिले।

हीबर की 1824 की डायरी में दर्ज है कि क्लीवलैंड की मौत के बाद कंपनी ने राजमहल में सख्त नीति लागू की। लेकिन तिलका का तीर एक संदेश दे गया –

“जंगल अब खामोश नहीं रहेगा।”

1855: संथाल का भाला – हूल की गर्जना

तिलका के 70 साल बाद वही सवाल फिर उठा। 1855 में संथाल परगना में सिदो और कान्हू ने “हूल” यानी विद्रोह का ऐलान किया।

कारण वही – महाजन का ब्याज, जमींदार का लगान, ब्रिटिश पुलिस का अत्याचार50,000 संथाल आदिवासी भाला, तीर और कुल्हाड़ी लेकर निकले। ब्रिटिश रिकॉर्ड में इसे “डकैती” कहा गया, लेकिन गांव-गांव में इसे “न्याय का युद्ध” माना गया।

ब्रिटिश सेना ने तोप और बंदूक से जवाब दिया। सरकारी आंकड़ों में 15,000 से 20,000 संथाल शहीद हुए। सिदो-कान्हू पकड़े गए और फांसी पर लटका दिए गए।

लेकिन हूल ने कंपनी को हिला दिया। 1857 से दो साल पहले संथालों ने दिखा दिया कि किसान और आदिवासी अब चुप नहीं बैठेंगे।

1928: भगत सिंह की पिस्तौल – शहर की क्रांति

bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story

संथाल के जंगल से संघर्ष अब शहर की गली में पहुंच गया। 1928 में लाला लाजपत राय की पुलिस लाठीचार्ज में मौत के बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने फैसला किया कि जवाब बंदूक से दिया जाएगा।

यह भी पढ़ें:  Bhagalpur Bridge News: विक्रमशिला सेतु के जॉइंट्स में बढ़ा अंतर, क्या फिर धंसेगा पुल? भागलपुर में हड़कंप!

17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अफसर जॉन सॉन्डर्स को गोली मारी गई। भगत सिंह ने अदालत में कहा –

“इंकलाब जिंदाबाद। हम खून का बदला खून से लेंगे।”

23 मार्च 1931 को तीनों को फांसी दी गई। भगत सिंह की पिस्तौल अब प्रतीक बन गई – पढ़े-लिखे युवा की ब्रिटिश राज को सीधी चुनौती

क्रांतिकारी आंदोलन 1905 से 1931 तक चला। खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, अशफाकुल्ला, चंद्रशेखर आजाद। आंकड़े बताते हैं कि इस दौरान 100 से ज्यादा क्रांतिकारी फांसी चढ़े

1944: INA की जापानी बंदूक – फौज का पलटवार

अगर तिलका ने तीर से, भगत सिंह ने पिस्तौल से सवाल पूछा, तो सुभाष चंद्र बोस ने पूरी फौज के साथ सवाल पूछा।

1944 में आजाद हिंद फौज जापानी मदद से इंफाल और कोहिमा तक पहुंच गई। 60,000 भारतीय सैनिक ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ खड़े थे। नारा था – “दिल्ली चलो।”

INA की हार हुई, लेकिन असर गहरा था। ब्रिटिश सेना में शक गहरा गया कि अगर युद्ध लंबा खिंचा तो भारतीय सैनिक किस तरफ खड़े होंगे।

1946: रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह – फौज का पलटवार

1946 में रॉयल इंडियन नेवी का विद्रोह इस शक को सच साबित कर गया। 78 जहाजों के 20,000 नौसैनिकों ने हथियार उठाए। मुंबई की सड़कों पर “लाल किला से लाल सलाम” के नारे लगे।

“राज किसका?” – 160 साल का जवाब

1784 से 1946 तक का सफर देखें तो पैटर्न साफ है:

दौरहथियारनेतृत्वमुद्दा
1784तीरतिलका मांझीजमीन, लगान, अकाल
1855भाला-कुल्हाड़ीसिदो-कान्हूमहाजन, जमींदार, ब्रिटिश पुलिस
1928पिस्तौलभगत सिंहराजनीतिक दमन, लाठीचार्ज
1944-46बंदूकसुभाष बोस, INAऔपनिवेशिक सत्ता का अंत

इतिहासकार प्रो. रमेश पांडे कहते हैं,

“तिलका से INA तक का सफर दिखाता है कि भारत की आजादी सिर्फ गांधी-नेहरू की मेज पर नहीं तय हुई। जंगल के तीर, किसान के भाले और सैनिक की बंदूक ने भी ब्रिटिश राज की नींव हिलाई।”

तिलका मांझी का तीर अगर राजमहल की पहाड़ी पर गड़ा, तो भगत सिंह की गोली लाहौर की अदालत में गूंजी। संथाल का भाला अगर गांव बचाने निकला, तो INA की बंदूक दिल्ली के दरवाजे तक पहुंची।

हथियार बदले, नेतृत्व बदले, रणनीति बदली। लेकिन 1784 से 1946 तक हर बार एक ही सवाल गूंजा – “राज किसका?”

bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story
bhagalpur news 1 question 4 weapons whose reign is it deshaj times special ep 14 the tilka manjhi story

और 15 अगस्त 1947 को उसका जवाब मिला – “राज जनता का।”

- Advertisement -

जरूर पढ़ें

Bihar IPS Officer News: चौंकाने वाला फैसला! Bihar की चर्चित IPS लेडी सिंघम दीक्षा ने छोड़ी बिहार सेवा, जानिए अब कहां करेंगी काम

पटना की तेजतर्रार आईपीएस अधिकारी दीक्षा ने वैवाहिक आधार पर अपना कैडर बदल लिया है। वह अब बिहार से एजीएमयूटी संवर्ग में शामिल हो गई हैं। गृह विभाग ने इस संबंध में#PatnaNews,#BiharIPS,#CadreChange

Bihar IPS Promotion News: बिहार में 4 महिला IPS अधिकारियों का जलवा! जानें किसे मिला बड़ा प्रमोशन, गृह विभाग का चौंकाने वाला फैसला

बिहार कैडर की चार महिला आईपीएस अधिकारियों, शैलजा, दिव्यांजली जायसवाल, गरिमा और साक्षी कुमारी को पदोन्नत किया गया है। गृह विभाग ने वरीय समय वेतनमान, वेतन स्तर-11#BiharIPS,#IPSpromotion,#BiharPolice

Railway Technician News: रेलवे टेक्नीशियन भर्ती: 6565 पदों पर बंपर मौका, क्या आप हैं तैयार?

रेलवे भर्ती बोर्ड ने टेक्नीशियन के 6565 पदों पर बंपर भर्ती का सांकेतिक नोटिस जारी किया है। 10वीं पास से लेकर डिग्रीधारक तक कर सकते हैं आवेदन। जानिए योग्यता, चयन#RRBRecruitment,#RailwayJobs,#SarkariNaukri

Jaipur Darbhanga News: रेलवे ने सुनाया यात्रियों को खुशखबरी! जयपुर-दरभंगा के बीच अब हर दिन चलेगी सीधी ट्रेन

जयपुर और दरभंगा के बीच सीधी दैनिक ट्रेन सेवा की घोषणा से लाखों यात्रियों को बड़ी राहत मिलेगी। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सांसद मंजू शर्मा की मांग पर अगले दो म#JaipurDarbhangaTrain,#BiharRailway,#IndianRailways