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Bhagalpur News: किसने लूटी चंपा की जवानी! पढ़िए -Special Story – मैं हूं 16 महा जनपदों की अंग ‘ मालिनी ‘

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चंपा नदी: कभी भारतीय संस्कृति की गहराइयों में बहने वाली, 16 महा जनपदों में से एक अंग की राजधानी की पहचान, आज खुद अपनी पहचान खो चुकी है। सवाल सामने है, आखिर किसने लूटी चंपा की जवानी! जो कभी जवान थी! जो नदी कभी जीवनदायिनी थी, आज ‘नाला’ बनकर अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।

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चंपा नदी: गुमनाम अतीत और वर्तमान की पीड़ा

मैं चंपा नदी हूं… या नाला? यह सवाल आज मुझे देखकर हर किसी के मन में उठता है। मेरा इतिहास भारतीय संस्कृति के प्रसार की गहराइयों में दर्ज है। उत्तर वैदिक काल के 16 महा जनपदों में अंग एक महत्वपूर्ण महाजनपद था। मेरी राजधानी चम्पा थी, जिसे वर्तमान में भागलपुर का चंपानगर कहा जाता है। वर्तमान बिहार के मुंगेर, बांका और भागलपुर जिले अंग महाजनपद के अंतर्गत आते थे। क्या आप जानते हैं इस ऐतिहासिक नदी का गौरवशाली अतीत?चंपा नदी: कभी भारतीय संस्कृति के विस्तार का गौरवशाली प्रतीक रही चंपा नदी आज अपनी पहचान खोती नजर आ रही है। सोलह महा जनपदों में से एक अंग की राजधानी चंपा का नाम आज शायद ही किसी को याद होगा। आइए जानते हैं, कैसे यह प्राचीन नदी एक समृद्ध सभ्यता का केंद्र थी और आज इसका क्या हाल है।

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चंपा नदी का गौरवशाली इतिहास और पौराणिक महत्व

अंग क्षेत्र और मेरे बारे में वाल्मीकि रामायण के बालकांड के नवम सर्ग के कई श्लोकों में विस्तृत वर्णन मिलता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। धार्मिक ग्रंथों में मेरा उल्लेख मेरे समृद्ध इतिहास को दर्शाता है।

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राजा रोमपाद और ऋष्यश्रृंग ऋषि की कथा

रामायण के अनुसार, महर्षि कश्यप के पुत्र विभाण्डक थे और उनके ही पुत्र ऋष्यश्रृंग थे। उस समय अंग देश में रोमपाद नामक एक शक्तिशाली और प्रतापी राजा थे। किसी कारण उनके द्वारा धर्म के उल्लंघन के कारण अनावृष्टि हुई, जिससे प्रजा भयभीत हो गई। ब्राह्मण मंत्रियों की सलाह पर राजा ने ऋष्यश्रृंग ऋषि को अंग की धरती पर लाने का निर्णय लिया, क्योंकि वे ही इस समस्या का समाधान कर सकते थे।ऋष्यश्रृंग ऋषि का आश्रम कोसी तट पर सनोखर के पास था। उस समय मधेपुरा का यह पूरा क्षेत्र अंग महाजनपद का अरण्य भाग कहलाता था। उन्हें यहां लाने के लिए देवदासियों का सहारा लिया गया और राजा रोमपाद इसमें सफल हुए। ऋष्यश्रृंग का अंग की धरती पर भव्य स्वागत किया गया। अंग की राजधानी मालिनी में अपने प्रवास के दौरान, ऋष्यश्रृंग ऋषि के गहन पर्यवेक्षण में एक नहर का निर्माण हुआ। इस नहर ने दक्षिण की नदियों की उफनती धाराओं को गंगा में मिलाने का मार्ग प्रशस्त किया, जिससे इस क्षेत्र को नया जीवन मिला। रोमपाद के पौत्र चंप के नाम पर बाद में मालिनी का नाम चम्पा हो गया, और उनके द्वारा निकाली गई यह नहर चंपा नदी कहलाई।

धार्मिक ग्रंथों में चंपा का विशेष उल्लेख

  • विष्णु पुराण के अनुसार, पृथुलाक्ष के पुत्र चंप ने इस नगरी को बसाया था – “ततश्चंपो यशश्चम्पां निवेश्यामास।”
  • हरिवंश पुराण और मत्स्य पुराण में कहा गया है – “चंपस्य तु पुरी चंपा या मालिन्यभवत् पुरा।”
  • महाभारत में उल्लेख है कि जरासंध ने कर्ण को मालिनी नगरी का राजा बनाया था, जिसे बाद में चम्पा कहा जाने लगा: “प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरीनथ। अंगेषु नरशार्दूल स राजाऽऽसीत् सपत्नजित्॥ पालयामास चम्पां च कर्ण: परबलार्दन:। दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथाच्॥”
  • प्राचीन कथाओं से ज्ञात होता है कि इस नगरी के चारों ओर चंपक वृक्षों की मालाकार पंक्तियां थीं, इसलिए इसे चंप मालिनी या केवल मालिनी भी कहते थे।
  • जातक-कथाओं और चीनी यात्री ह्वेनत्सांग के यात्रावृतांत में भी चंपा का उल्लेख मिलता है, जो इस क्षेत्र की समृद्धि और संपन्न व्यापारियों को दर्शाता है।
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चंपा में कौशेय (रेशम) का सुंदर कपड़ा बुना जाता था, जिसका व्यापार भारत से बाहर दक्षिणपूर्व एशिया के अनेक देशों तक होता था। रेशमी कपड़े की बुनाई की यह परम्परा वर्तमान भागलपुर में आज भी जीवित है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

प्राचीन व्यापार और सांस्कृतिक महत्व

ऐतिहासिक कथाओं से ज्ञात होता है कि चंपा नगरी के चारों ओर चंपक वृक्षों की सुंदर पंक्तियाँ थीं, जिसके कारण इसे चंप मालिनी या केवल मालिनी भी कहा जाता था। जातक कथाओं और प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनत्सांग के यात्रा वृत्तांत में भी इस क्षेत्र की समृद्धि का उल्लेख मिलता है। यहां के संपन्न व्यापारी दूर-दूर तक व्यापार करते थे, और चंपा कौशेय यानी रेशम के सुंदर कपड़ों की बुनाई के लिए प्रसिद्ध थी।चंपा से रेशमी कपड़ों का व्यापार न केवल भारत के भीतर बल्कि दक्षिणपूर्व एशिया के कई देशों तक फैला हुआ था। यह परंपरा आज भी भागलपुर में रेशमी कपड़ों की बुनाई के रूप में जीवित है, जो इस प्राचीन नगरी के सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व की गवाही देती है। हालांकि, आज यह गौरवशाली नदी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है और वर्तमान में यह अपनी पहचान एक नाले के रूप में देख रही है, जो इसके समृद्ध इतिहास का एक दुखद अंत है।आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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