बिहार में शराबबंदी कानून पर पटना उच्च न्यायालय ने एक बार फिर अपना कड़ा रुख दिखाया है। एक ऐसा फैसला आया है, जिसने उन हजारों वाहन मालिकों को बड़ी राहत दी है, जिनकी गाड़ियां शराब के अवैध धंधे में पकड़े जाने के बाद जब्त कर ली गई थीं। यह सिर्फ एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि शराबबंदी कानून के तहत की गई कार्रवाई की दिशा में एक नया मोड़ है।
जब्त वाहनों पर मालिकाना हक
पटना उच्च न्यायालय ने शराबबंदी कानून के तहत जब्त किए गए वाहनों के संबंध में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब्त की गई गाड़ी और बाइक, दोनों ही मामलों में वाहन मालिक के पक्ष में निर्णय दिया जाएगा। यह फैसला उन सभी लोगों के लिए आशा की किरण लेकर आया है, जिनके वाहन शराब से जुड़े मामलों में अधिकारियों द्वारा जब्त कर लिए गए थे।
इस फैसले से बिहार निषेध और उत्पाद अधिनियम के तहत हुई कार्रवाई से प्रभावित वाहन मालिकों को बड़ी राहत मिलेगी। अब तक, कई मामलों में वाहन जब्त कर लिए जाते थे और मालिकों को अपने वाहनों को वापस पाने के लिए लंबी कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था। उच्च न्यायालय के इस रुख से ऐसे मामलों में न्याय की प्रक्रिया तेज होने की उम्मीद है।
कानून का सख्त लेकिन न्यायपूर्ण चेहरा
अदालत का यह निर्णय दर्शाता है कि कानून का उद्देश्य अपराधियों को दंडित करना है, न कि निर्दोष वाहन मालिकों को अनावश्यक परेशानी में डालना। इस फैसले के बाद, यह उम्मीद की जा रही है कि संबंधित अधिकारी जब्त वाहनों से जुड़े मामलों को और अधिक संवेदनशीलता और शीघ्रता से निपटाएंगे।
राज्य में शराबबंदी लागू होने के बाद से, वाहनों की जब्ती एक आम बात हो गई थी, जिसके कारण कई विवाद उत्पन्न हुए। इस न्यायिक हस्तक्षेप से यह स्पष्ट होता है कि शराबबंदी कानून को लागू करते समय भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों और संपत्ति के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न केवल वाहन मालिकों को राहत देगा, बल्कि बिहार में शराबबंदी कानून के तहत की जाने वाली कार्रवाई में और अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही भी लाएगा। यह दर्शाता है कि न्यायपालिका कानून के अनुपालन के साथ-साथ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है।





