

Daughters funeral: जब अपनों ने मुंह मोड़ा, तब ममता की छांव ने ही चिता को राह दी। समाज के बंधनों को तोड़कर दो बेटियों ने अपनी मां के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी संभाली और अब वे उनकी आत्मा की शांति के लिए सामाजिक सहायता की गुहार लगा रही हैं।
Daughters funeral: छपरा की बेटियों का संघर्ष और समाज की चुप्पी
बिहार के छपरा से एक हृदय विदारक वीडियो सामने आया है, जिसने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। इस वीडियो में दो बेटियां अपनी दिवंगत मां की अर्थी को कंधा देती हुई दिखाई दे रही हैं, जो आमतौर पर बेटों का कर्तव्य माना जाता है। यह दृश्य न केवल पारंपरिक सोच को चुनौती देता है, बल्कि उन परिस्थितियों को भी उजागर करता है जब अपनों के साथ खड़े होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वे पीछे हट जाते हैं। यह घटना छपरा के सोनपुर इलाके की बताई जा रही है, जहां गरीबी और सामाजिक उपेक्षा के बीच बेटियों ने अपनी मां का आखिरी सहारा बनकर मिसाल कायम की। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
मां के निधन के बाद, जब कोई पुरुष सदस्य अर्थी को कंधा देने के लिए आगे नहीं आया, तो इन दोनों बेटियों ने यह कठिन जिम्मेदारी उठाई। उनमें से एक बेटी ने तो अपनी मां को मुखाग्नि भी दी, जो भारतीय परंपरा में पुत्र द्वारा किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। इस दुखद पल में, बेटियों का यह साहस और समर्पण देखकर हर कोई स्तब्ध है। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर अपनी मां के प्रति अंतिम कर्तव्य निभाने का दृढ़ संकल्प स्पष्ट झलक रहा था।
वर्तमान में, ये बेटियां अपनी मां के निधन के बाद होने वाले ‘श्राद्ध कर्म’ के लिए समाज से मदद की गुहार लगा रही हैं। भारतीय संस्कृति में श्राद्ध कर्म का अत्यधिक महत्व है और इसके बिना आत्मा को शांति नहीं मिलती ऐसा माना जाता है। आर्थिक तंगी के कारण वे इस महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान को संपन्न करने में असमर्थ हैं। उनकी यह मार्मिक अपील उन सभी सामाजिक संगठनों और दानदाताओं के लिए एक आह्वान है, जो जरूरतमंदों की सहायता के लिए आगे आते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अपनी मां को अंतिम सम्मान तो दे दिया, लेकिन अब ‘श्राद्ध कर्म’ पूरा करने के लिए उन्हें समाज के सहयोग की अत्यंत आवश्यकता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1, जो आपको सच्ची और मार्मिक खबरें दिखाता है।
देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
मदद की गुहार और आगे की राह
इस घटना ने एक बार फिर समाज में बेटियों की भूमिका और उनके प्रति हमारी सोच पर विचार करने का अवसर दिया है। यह सिर्फ एक अंतिम संस्कार या श्राद्ध कर्म का मामला नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों, पारिवारिक संबंधों और सामाजिक दायित्वों का एक बड़ा प्रश्न है। इन बेटियों ने जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में अपनी मां का साथ दिया, वह न केवल प्रेरणादायक है बल्कि यह भी दर्शाता है कि समय आने पर बेटियां किसी से कम नहीं होतीं। स्थानीय प्रशासन और सामाजिक संगठनों को इन बेटियों की मदद के लिए तुरंत आगे आना चाहिए ताकि वे अपनी मां के अंतिम संस्कार से जुड़े सभी अनुष्ठानों को गरिमापूर्ण तरीके से पूरा कर सकें। ऐसे में हमारा समाज ही उन्हें संबल प्रदान कर सकता है।



