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मार्च, 12, 2026
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Darbhanga Anganwadi News: ‘दीदी’ भूखी, नौनिहाल कैसे खाएं? 4 महीने से वेतन नहीं, बेनीपुर में आंगनबाड़ी सेविकाओं का दर्द छलका

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Anganwadi News: जो दूसरों की भूख और कुपोषण को दूर करने का जिम्मा संभालती हैं, आज वे खुद ही कुपोषण का शिकार होने को मजबूर हैं। बिहार के बेनीपुर में आंगनबाड़ी सेविकाएं और सहायिकाएं पिछले चार महीनों से अपने वेतन के लिए तरस रही हैं, जिससे उनके घरों में चूल्हा जलाना भी मुश्किल हो गया है।

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Anganwadi News: चुनाव से पहले बढ़ाया मानदेय, अब भुगतान लटकाया

बेनीपुर प्रखंड में कुल 287 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित हैं, जहां हर केंद्र पर एक सेविका और एक सहायिका की नियुक्ति की गई है। इनका काम हर दिन 35 बच्चों को पौष्टिक आहार देना और उन्हें स्कूल-पूर्व शिक्षा प्रदान करना है। सरकार ने सेविका के लिए ₹9000 और सहायिका के लिए ₹4500 मासिक मानदेय निर्धारित किया है। कुछ सेविकाओं ने बताया कि विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उनके मानदेय में ₹2000 की बढ़ोतरी की गई थी, जो पहले ₹7000 था। चुनाव के समय सरकार ने ₹9000 मासिक भुगतान का निर्देश भी दिया और कुछ महीनों तक यह राशि मिली भी। लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुए, भुगतान की प्रक्रिया पटरी से उतर गई और अब चार महीने से वे बिना वेतन के काम कर रही हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।इसके अलावा, बच्चों, गर्भवती और धात्री महिलाओं के लिए टेक होम राशन (THR) के मद में सेविका के खाते में ₹4000 से लेकर ₹16000 तक की राशि का भुगतान किया जाता है, लेकिन मुख्य मानदेय न मिलने से उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई है।Darbhanga Anganwadi News: 'दीदी' भूखी, नौनिहाल कैसे खाएं? 4 महीने से वेतन नहीं, बेनीपुर में आंगनबाड़ी सेविकाओं का दर्द छलका

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काम अनेक, दाम कम, वो भी समय पर नहीं

आंगनबाड़ी सेविकाओं का दर्द सिर्फ समय पर वेतन न मिलना ही नहीं है। उनका कहना है कि सरकार द्वारा निर्धारित राशि न्यूनतम मजदूरी से भी कम है, जिसे ‘सेवा’ के नाम पर ‘मानदेय’ कहा जाता है। यह मानदेय भी समय पर नहीं मिलता, जिससे उनके अपने बच्चों का पालन-पोषण करना मुश्किल हो गया है। आंगनबाड़ी केंद्रों के संचालन के अलावा, इन सेविकाओं और सहायिकाओं से समय-समय पर कई अन्य सरकारी कामों में भी ड्यूटी लगाई जाती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। कभी चुनाव में मतदाताओं की पहचान करने का काम, तो कभी टीकाकरण और पल्स पोलियो अभियान को सफल बनाने की जिम्मेदारी, इन सभी कामों के लिए उन्हें कोई अलग से भुगतान नहीं किया जाता है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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अधिकारी ने झाड़ा पल्ला, बोले- विभाग से होता है भुगतान

जब इस गंभीर समस्या के बारे में बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (CDPO) रंजीत कुमार से बात की गई, तो उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कहा, “कार्यालय से हर महीने उपस्थिति का विवरण विभाग को भेज दिया जाता है। विभाग द्वारा ही सीधे आईएफएमएस (IFMS) के माध्यम से सेविकाओं के बैंक खाते में भुगतान किया जाता है। इसमें स्थानीय कार्यालय की कोई भूमिका नहीं है।” अधिकारियों के इस रवैये से सेविकाओं में भारी रोष है। उनका कहना है कि अगर जल्द ही उनके बकाये वेतन का भुगतान नहीं किया गया, तो वे काम बंद करने पर मजबूर हो जाएंगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

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