

Farmer Registry: अन्नदाताओं के नसीब पर डिजिटल इंडिया का पहिया ऐसा फिसला है कि सरकारी योजनाओं की गाड़ी आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही। जाले प्रखंड में किसानों के लिए यह प्रक्रिया गले की फांस बन गई है, जहां तकनीकी खामियां और अधिकारियों की हड़ताल ने उन्हें पूरी तरह से अधर में लटका दिया है।
अधिकारियों की हड़ताल से Farmer Registry ठप
जाले प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न पंचायतों में फार्मर रजिस्ट्री का कार्य बुरी तरह प्रभावित हो गया है। आलम यह है कि शिविरों में बड़ी संख्या में किसान पहुंच तो रहे हैं, लेकिन तकनीकी और राजस्व संबंधी समस्याओं के चलते उन्हें हर दिन निराश होकर लौटना पड़ रहा है। रतनपुर पंचायत के किसान गोपी कृष्ण ठाकुर, धर्मेन्द्र प्रताप ठाकुर और कन्हैया झा ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि ई-केवाईसी की प्रक्रिया तो कृषि समन्वयकों द्वारा पूरी की जा रही है, लेकिन असली समस्या राजस्व से जुड़ी त्रुटियों की है। इन तकनीकी समस्याओं का समाधान केवल अंचल अधिकारी और राजस्व अधिकारी के स्तर से ही संभव है।
चूंकि अंचल अधिकारी और संबंधित राजस्व अधिकारी 2 फरवरी से ही अनिश्चितकालीन हड़ताल पर हैं, इसलिए फार्मर आईडी जेनरेट करने का काम लगभग ठप हो गया है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। प्रभारी अधिकारियों के पास इसका कोई प्रभावी विकल्प मौजूद नहीं है, जिससे किसानों की परेशानी दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।
ऑनलाइन रिकॉर्ड में खाता-खेसरा गायब, कैसे बने आईडी?
किसानों ने बताया कि कई मामलों में उनकी जमीन अब भी उनके पूर्वजों के नाम से ही दर्ज है। जिन जमीनों का लगान वे वर्षों से नियमित रूप से चुकाते आ रहे थे, ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू होने के बाद उन्हीं लगान रसीदों में गंभीर त्रुटियां सामने आ गई हैं। इन रसीदों में जमीन का रकबा तो दर्ज है, लेकिन खाता और खेसरा संख्या शून्य दिखाया जा रहा है। बिना खाता-खेसरा के फार्मर आईडी जेनरेट होना असंभव है, जिस कारण किसान सरकारी योजनाओं के लाभ से सीधे तौर पर वंचित हो रहे हैं।
राजस्व कर्मचारियों के अनुसार, बिना खाता और खेसरा के फार्मर आईडी नहीं बन सकता। ऐसे किसानों को ‘परिमार्जन प्लस’ पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करना होगा, जिसके बाद नक्शा मिलान कर त्रुटि में सुधार किया जाएगा। हालांकि, अधिकारियों के हड़ताल पर होने के कारण यह प्रक्रिया भी पूरी तरह से अधर में लटकी हुई है।
प्रशासनिक लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे किसान
किसानों का आरोप है कि यह पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है। उन्होंने बताया कि रजिस्टर टू में उनकी जमीन का पूरा विवरण दर्ज था और उसी के आधार पर वर्षों से लगान की वसूली होती रही। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। ऑनलाइन प्रक्रिया के दौरान कर्मियों ने रकबा तो दर्ज कर दिया और लगान भी वसूल लिया, लेकिन खाता और खेसरा का विवरण ऑनलाइन चढ़ाना भूल गए। इसी लापरवाही का खामियाजा आज क्षेत्र के सैकड़ों किसानों को भुगतना पड़ रहा है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
इस संबंध में जब प्रभारी बीडीओ मनोज कुमार से बात की गई तो उन्होंने बताया कि डोंगल का प्रभार उन्हें सौंपा गया है और विभागीय निर्देश के अनुसार ही कार्य किया जाएगा। वहीं, किसानों ने मांग की है कि सरकारी अमीनों की कमी को देखते हुए निजी अमीनों द्वारा किए गए नक्शा मिलान को मान्यता दी जाए। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि राजस्व अधिकारियों की हड़ताल जल्द से जल्द समाप्त करवाकर फार्मर रजिस्ट्री की प्रक्रिया को शीघ्र सुचारू किया जाए। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

