

Darbhanga News: कानून के हाथ लंबे होते हैं, यह कहावत तो सबने सुनी है, लेकिन दरभंगा की धरती पर इसे सच साबित होने में 32 साल का लंबा वक्त लग गया। दशकों पुराने एक चर्चित हत्याकांड में आखिरकार न्याय का हथौड़ा चला है।
Darbhanga News: दो वकीलों समेत पांच दोषियों को मिली उम्रकैद
दरभंगा सिविल कोर्ट के अपर सत्र न्यायाधीश सुमन कुमार दिवाकर की अदालत ने शनिवार को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए लगभग 32 वर्षों से लंबित हत्या और जानलेवा हमले के मामले में दो वकीलों सहित पांच लोगों को आजीवन सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही सभी दोषियों पर दस-दस लाख रुपये का भारी अर्थदंड भी लगाया गया है। लोक अभियोजक अमरेंद्र नारायण झा ने बताया कि यह मामला 8 अगस्त 1994 का है, जिसने पूरे इलाके को दहला दिया था।
अदालत ने सत्रवाद संख्या 320/2010 में पूर्व लोक अभियोजक कौशर इमाम हाशमी को और सत्रवाद संख्या 326/1999 में चर्चित वकील अम्बर इमाम हाशमी, राजा हाशमी, अंजार हाशमी और मोविन हाशमी को दोषी पाते हुए यह सजा मुकर्रर की है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। दोषियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/149 और 307/149 समेत आर्म्स एक्ट के तहत यह सजा सुनाई गई है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में उन्हें एक साल की अतिरिक्त साधारण कारावास की सजा भुगतनी होगी।
क्या था 32 साल पुराना यह खूनी संघर्ष?
अभियोजन पक्ष के अनुसार, यह पूरा मामला दरभंगा के विशनपुर थाना क्षेत्र के पटोरी-बसंत गांव का है। 8 अगस्त 1994 की शाम करीब 7 बजे पटोरी गांव के कुछ पशुपालक अपने मवेशियों को गुणसार पोखर से पानी पिलाकर लौट रहे थे। तभी कब्रिस्तान और रास्ते को लेकर हुए पुराने विवाद में बसंत गांव के लोगों ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। इस गोलीबारी में किसान रामकृपाल चौधरी उर्फ कपल चौधरी की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि एक अन्य घायल रामपुकार चौधरी ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था।
इस खूनी झड़प में मोहन चौधरी, रविंदर चौधरी, अशोक चौधरी समेत आठ अन्य लोग भी गोलियां लगने से गंभीर रूप से घायल हुए थे। इस जघन्य अपराध के संबंध में अगले दिन 9 अगस्त 1994 को विशुनपुर थाने में प्राथमिकी संख्या 58/94 दर्ज की गई थी, जिसमें 13 नामजद और 10 अज्ञात लोगों को अभियुक्त बनाया गया था। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। कानूनी प्रक्रिया के लंबे दौर में कई अभियुक्तों की मृत्यु हो गई, कुछ फरार हो गए, लेकिन आखिरकार कानून ने अपना काम किया। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
न्याय के लिए एक लंबी और थका देने वाली लड़ाई
यह चर्चित पटोरी हत्याकांड दो अलग-अलग सत्रवाद (326/1999 और 320/2010) के तहत न्यायालय में विचाराधीन था। इतने वर्षों में कई गवाह और अभियुक्त इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन पीड़ित पक्ष न्याय की उम्मीद में डटा रहा। पीड़ित पक्ष के वकील चंद्रकांत सिंह ने इस फैसले को अपने गुरु स्वर्गीय ब्रजमोहन सिंह के प्रति सच्ची गुरुदक्षिणा बताया। शनिवार को जब अदालत ने अपना फैसला सुनाया तो पीड़ितों के परिजनों की आंखों में आंसू छलक आए। अदालत ने एपीपी रेणु झा की याचना को स्वीकार करते हुए सभी घायलों को पीड़ित प्रतिकर योजना के तहत मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। 32 साल बाद आए इस फैसले को जिले के सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण फैसलों में से एक माना जा रहा है।



