Darbhanga Theater News: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय (LNMU) के संगीत एवं नाट्य विभाग द्वारा आयोजित पांच दिवसीय रंगमंचीय कार्यशाला “कहानी और रंगमंच” का तीसरा दिन कला प्रेमियों और प्रतिभागियों के लिए यादगार रहा। इस विशेष सत्र में, नाट्य प्रस्तुति को कथावाचन और गायकी के अनूठे मेल से कैसे जीवंत बनाया जाए, इसका गहन प्रशिक्षण दिया गया। प्रसिद्ध रंगकर्मी कुंदन कुमार ने कलाकारों को भारतीय नाट्य परंपरा की गहराइयों से रूबरू कराया, जिससे उनमें नई ऊर्जा और समझ का संचार हुआ।आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
भारतीय रंगमंच में कथा-गायकी का ऐतिहासिक महत्व
प्रशिक्षक कुंदन कुमार ने कार्यशाला के तीसरे सत्र में प्रतिभागियों को भारतीय रंगमंच की समृद्ध और प्राचीन परंपरा से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि सदियों से कथावाचन और गायकी ने भारतीय नाट्य कला में एक केंद्रीय भूमिका निभाई है। नाटक केवल संवादों और अभिनय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संगीत, स्वर, लय और भावाभिव्यक्ति का भी उतना ही महत्व है।कुंदन कुमार ने जोर देकर कहा कि इन सभी तत्वों का सही समन्वय ही किसी भी नाट्य प्रस्तुति को दर्शकों के लिए अधिक प्रभावशाली, संवेदनशील और आकर्षक बना सकता है। उन्होंने समझाया कि कथा के प्रवाह, पात्रों की मनःस्थिति और संवादों की लय को गायकी के प्रयोग से किस प्रकार दर्शकों के हृदय तक सीधे पहुंचाया जा सकता है, जिससे प्रस्तुति का प्रभाव और भी गहरा हो जाता है। यह प्रशिक्षण नाट्य कला के मूलभूत सिद्धांतों को समझने में सहायक सिद्ध हुआ।
व्यावहारिक प्रशिक्षण और कलाकारों का उत्साहजनक प्रदर्शन
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण दृश्यों पर व्यावहारिक अभ्यास भी कराया गया। प्रशिक्षक ने मंच पर कलाकार की आवाज़ के उतार-चढ़ाव, शारीरिक अभिव्यक्ति और संगीत के संतुलित प्रयोग की बारीकियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने बताया कि ये सभी तत्व मिलकर ही किसी भी नाट्य प्रस्तुति को जीवंत और यथार्थवादी बना सकते हैं।विद्यार्थियों ने बड़े उत्साह के साथ कथा को मंच पर प्रस्तुत करने, स्वरों का सही उपयोग करने और गायन के माध्यम से अपनी भावनाओं को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने का अभ्यास किया। कुंदन कुमार ने इस बात पर विशेष बल दिया कि एक सफल रंगकर्मी बनने के लिए अभिनय कौशल के साथ-साथ कथावाचन और संगीत की गहरी समझ होना भी अत्यंत आवश्यक है। यह एकीकृत दृष्टिकोण कलाकारों को बहुमुखी प्रतिभा विकसित करने में मदद करेगा।कार्यशाला में उपस्थित सभी विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी की, अपने संदेह स्पष्ट किए और रंगमंच की बारीकियों को समझने के लिए उत्सुकता से कई प्रश्न भी पूछे। इस गहन सत्र ने उनमें रंगमंच के प्रति एक नई दृष्टि और प्रेरणा का संचार किया, जिससे उन्हें अपनी कला को और अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की दिशा मिली। यह प्रशिक्षण कलाकारों के आत्मविश्वास में वृद्धि करने और उन्हें एक पूर्ण रंगकर्मी के रूप में विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा।
LNMU की पहल और रंगमंच के भविष्य की दिशा
विभागाध्यक्ष और कार्यशाला की संयोजक प्रोफेसर लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ के कुशल मार्गदर्शन में यह पांच दिवसीय कार्यशाला सफलतापूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को रंगमंच की व्यावहारिक और सैद्धांतिक दोनों तरह की गहन समझ प्रदान करना है, ताकि वे केवल अभिनय ही नहीं, बल्कि नाट्य कला के हर पहलू को बारीकी से जान सकें। यह प्रशिक्षण उन्हें भविष्य में एक सशक्त और संवेदनशील कलाकार बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने में मदद करेगा।प्रतिभागियों ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि कथा एवं गायकी के माध्यम से नाट्य प्रस्तुति की यह प्रक्रिया उनके लिए एक नई सीख लेकर आई है। उन्होंने महसूस किया कि कैसे भारतीय कला रूपों का संगम रंगमंच को और अधिक समृद्ध बना सकता है। कार्यशाला के आगामी सत्रों में नाट्य प्रशिक्षण के अन्य महत्वपूर्ण आयामों जैसे मंच सज्जा, प्रकाश व्यवस्था और निर्देशन पर भी विस्तृत चर्चा और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा, जिससे कलाकारों को समग्र विकास का अवसर मिलेगा।देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करेंआप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय की यह पहल दरभंगा के सांस्कृतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह युवा प्रतिभाओं को रंगमंच की दुनिया में गहराई से जुड़ने और अपनी कला को निखारने के लिए प्रेरित कर रही है। विश्वविद्यालय का यह प्रयास कला और संस्कृति के क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा और बिहार में नाट्य कला को एक नई पहचान दिलाने में सहायक होगा।







