Darbhanga University News: ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में हाल ही में एक महत्वपूर्ण पहल का आगाज हुआ है। विश्वविद्यालय के ललित कला संकाय के अंतर्गत संगीत एवं नाट्य विभाग द्वारा ‘कहानी और रंगमंच’ नामक एक पांच दिवसीय रंगमंचीय कार्यशाला का भव्य शुभारंभ किया गया है। इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों और रंगकर्मियों को रंगमंच की विभिन्न विधाओं, अभिनय कला और नाट्य प्रस्तुति की गहन बारीकियों से परिचित कराना है।यह विशेष कार्यशाला 8 से 12 जून तक चलेगी, जिसमें बड़ी संख्या में विद्यार्थियों, शोधार्थियों और कला-प्रेमियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। कार्यक्रम का आयोजन विभागाध्यक्ष और संयोजक प्रो लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ के कुशल मार्गदर्शन में किया जा रहा है। उद्घाटन सत्र में उपस्थित सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए उन्होंने रंगमंच के महत्व पर प्रकाश डाला।आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
रंगमंच: मनोरंजन से बढ़कर एक सशक्त माध्यम
प्रो लावण्य कीर्ति सिंह ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। उन्होंने कहानी और रंगमंच के गहरे संबंध पर जोर देते हुए बताया कि किसी भी कहानी को जीवंत रूप प्रदान करने में रंगमंच की भूमिका अतुलनीय होती है। ऐसी कार्यशालाएं विद्यार्थियों की रचनात्मक क्षमता को विकसित करने के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व निर्माण में भी महत्वपूर्ण सहायक सिद्ध होती हैं।कार्यशाला के मुख्य प्रशिक्षक, पटना के जाने-माने रंगकर्मी कुंदन कुमार, जिन्हें ‘भिखारी ठाकुर युवा सम्मान’ से सम्मानित किया गया है, ने अपने संबोधन में कहानी और रंगमंच के अंतर्संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि साहित्य में लिखी गई किसी भी कहानी को मंच पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए कल्पनाशीलता, अभिनय कौशल, संवाद अदायगी और मंचीय अनुशासन बेहद आवश्यक हैं।
अभिनय कौशल और मंच प्रस्तुति की बारीकियां
प्रशिक्षक कुंदन कुमार ने प्रतिभागियों को अभिनय के मूल सिद्धांतों से अवगत कराया। इसमें शारीरिक अभिव्यक्ति, स्वर-साधना, संवाद प्रस्तुति और चरित्र निर्माण की विभिन्न तकनीकों की विस्तृत जानकारी दी गई। प्रशिक्षण सत्र के दौरान, विद्यार्थियों को कई व्यावहारिक गतिविधियों में शामिल किया गया, जिससे उन्हें मंचीय कला के विविध आयामों को समझने का अवसर मिला।समूह अभ्यास, अभिनय प्रयोग, तात्कालिक प्रस्तुति और संवाद-अभिनय जैसी गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों ने अपनी प्रतिभा को निखारा। प्रशिक्षक ने इस बात पर जोर दिया कि रंगमंच व्यक्ति के आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता, अभिव्यक्ति कौशल और सामाजिक चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इस कार्यशाला में कहानी के चयन, उसके नाट्य रूपांतरण, पटकथा निर्माण, मंच-सज्जा, प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि प्रभाव और प्रस्तुति तकनीकों पर भी गहन चर्चा हुई।आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक अनुभव
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को समझाया गया कि किसी साहित्यिक रचना को रंगमंच पर प्रस्तुत करते समय उसकी मूल भावना को बनाए रखना कितना महत्वपूर्ण है, ताकि वह दर्शकों के लिए अधिक प्रभावशाली और संप्रेषणीय बन सके। विद्यार्थियों ने कार्यशाला के पहले दिन के अनुभव को अत्यंत प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक बताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम उन्हें रंगमंच की व्यावहारिक समझ प्रदान करते हैं और उनकी सृजनात्मक प्रतिभा को एक नई दिशा देते हैं।कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक कई प्रश्न पूछे, जिनका प्रशिक्षक द्वारा विस्तार से उत्तर दिया गया। अंत में, विभागाध्यक्ष प्रो लावण्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ ने सभी प्रतिभागियों को नियमित रूप से कार्यशाला में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि आगामी दिनों में अभिनय, निर्देशन, मंच-प्रबंधन, नाट्य लेखन और प्रस्तुति कला से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर विशेष प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाएंगे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह कार्यशाला विद्यार्थियों के लिए अत्यधिक उपयोगी सिद्ध होगी और विश्वविद्यालय में रंगमंचीय गतिविधियों को एक नई ऊर्जा प्रदान करेगी। यह Bihar Theater News के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम है। कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिससे सभी के मन में उत्साह और प्रेरणा का संचार हुआ।देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें






