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मार्च, 12, 2026
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Darbhanga LNMU में उतरा देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद का आदर्श, जुबली हॉल में राष्ट्रपति के जीवन और प्रेरणा को किया आत्मसात

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दरभंगा न्यूज: भारत के पहले राष्ट्रपति और देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती पर ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में एक खास समारोह का आयोजन हुआ। एक ऐसे राष्ट्रपति, जिन्होंने अपने जीवन से पद की गरिमा को सर्वोच्च रखा और सादगी को अपनी पहचान बनाया। आखिर उनके जीवन के वो कौन से प्रेरक पहलू हैं, जो आज भी नई पीढ़ी को राह दिखाते हैं और क्यों उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं?

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ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के जुबिली हॉल में आयोजित इस संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रोफेसर संजय कुमार चौधरी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत और बिहार के इतिहास की एक जाज्वल्यमान विभूति बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के रूप में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने आदर्श मर्यादा कायम की। उनका जीवन संघर्षों से भरा रहा, फिर भी उन्होंने अथक परिश्रम से कई डिग्रियां हासिल कीं। कुलपति ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और देश के विकास में उनके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया।

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प्रोफेसर चौधरी ने आगे कहा कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद एक अत्यंत कुशल राष्ट्रपति थे। वे कई बार विधेयकों पर गहन विचार-विमर्श कर सुधार के लिए सरकार को वापस भेजते थे। उनके जीवन से हमें ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ अपनाने की प्रेरणा मिलती है। कुलपति ने जोर दिया कि ऐसे आयोजनों को केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि नई पीढ़ी को महापुरुषों के जीवन से सीख लेनी चाहिए ताकि देश 2047 तक विकसित और विश्वगुरु बन सके। इस समारोह में 300 से अधिक शिक्षकों और छात्र-छात्राओं ने हिस्सा लिया।

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सादगी और विचारों की महानता

कुलसचिव डॉ. दिव्या रानी हांसदा ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीवन को अति प्रेरणादायक बताया। उन्होंने कहा कि सादगी और विनम्रता ही उनकी वास्तविक पहचान थी। उनका मानना था कि पद नहीं, बल्कि विचार महान होता है। संविधान निर्माण में अमूल्य योगदान देने वाले राजेंद्र बाबू का यह दृढ़ विश्वास था कि जब गांव सशक्त होगा, तभी देश का वास्तविक विकास संभव है। डॉ. हांसदा ने सभी से उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लेने का आह्वान किया।

शिक्षा संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो. शशि भूषण राय ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके मूल्यपरक शिक्षा और संस्कारों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यदि हम डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बताए मार्ग पर चलेंगे तो समाज निश्चित रूप से प्रगति करेगा और हमारी भावी पीढ़ी भारत को एक महान राष्ट्र बनाने में सक्षम होगी।

संविधान निर्माता और मार्गदर्शक

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम डब्ल्यूआईटी के निदेशक प्रो. अजय नाथ झा ने कहा कि भारत के प्रथम राष्ट्रपति की जीवन शैली और विचारों को आत्मसात करने की आवश्यकता है। उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को एक ऐसे मार्गदर्शक बताया जिनमें सभी मानवीय गुण मौजूद थे। राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो. मुनेश्वर यादव ने विश्वविद्यालय में पहली बार डॉ. राजेंद्र प्रसाद की जयंती मनाए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि स्वप्न द्रष्टा राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में एक अमिट छाप छोड़ी है और उनका जीवन व कार्य हमेशा अनुकरणीय रहेगा।

सम्मान समारोह और आयोजन की रूपरेखा

इस अवसर पर समाजशास्त्र विभाग द्वारा आयोजित भाषण प्रतियोगिता के विजेताओं को कुलपति ने सम्मानित किया। विभा कुमारी को प्रथम, वैष्णवी कुमारी को द्वितीय तथा लाल कुमार और तबस्सुम परवीन को संयुक्त रूप से तृतीय स्थान प्राप्त करने के लिए प्रमाण पत्र दिए गए। इसके अतिरिक्त, विभिन्न कॉलेजों से आए एनएसएस स्वयंसेवकों, पीजी एवं डब्ल्यूआईटी के 250 से अधिक छात्र-छात्राओं को भी कुलपति के हस्ताक्षर वाले प्रमाण पत्र प्रदान किए जाएंगे।

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कार्यक्रम के संयोजक और सामाजिक विज्ञान के संकायाध्यक्ष प्रो. मो. शाहिद हसन ने स्वागत संबोधन में बताया कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद का जन्म आज ही के दिन 1884 में बिहार के सारण जिले के जीरादेई गांव में हुआ था। राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी वे आम लोगों का जीवन जीते थे और इसी कारण वे अत्यधिक लोकप्रिय हुए। संगोष्ठी की शुरुआत डॉ. राजेंद्र प्रसाद की तस्वीर पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित करने तथा दीप प्रज्वलन के साथ हुई। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर और बुके भेंट कर किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन समाजशास्त्र की प्राध्यापिका डॉ. सुनीता कुमारी और प्राध्यापक डॉ. प्रमोद गांधी ने संयुक्त रूप से किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन डॉ. सरिता कुमारी ने किया।

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