
Dhaincha Farming: खेती-किसानी करने वालों के लिए एक बड़ी खबर है, जो धान की खेती में मोटा पैसा खर्च करते हैं! अब उनकी लागत घट सकती है और मिट्टी भी पहले से ज्यादा उपजाऊ हो सकती है। कृषि वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक बताई है, जिससे किसानों को दोहरा फायदा होगा।
क्या है ढैंचा और कैसे करें इसकी बुवाई?
कृषि विज्ञान केंद्र जाले के अध्यक्ष और वरीय वैज्ञानिक डॉ. दिव्यांशु शेखर के मुताबिक, ढैंचा को हरी खाद के रूप में अप्रैल से जुलाई के बीच बोया जाता है। एक हेक्टेयर जमीन में इसकी बुवाई के लिए 15 से 20 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है। बुवाई के करीब 50 से 55 दिनों बाद जब फसल अच्छी तरह तैयार हो जाए, तो उसे खेत में मिला दिया जाता है। इस प्रक्रिया से मिट्टी को लगभग 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 15 किलोग्राम फॉस्फोरस और 10 किलोग्राम पोटाश जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व मिलते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
यह जैविक प्रक्रिया न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, बल्कि धान की खेती में रासायनिक उर्वरकों पर होने वाले खर्च को भी काफी हद तक कम कर देती है। Dhaincha Farming एक ऐसा उपाय है, जिससे किसानों को आर्थिक रूप से बड़ी राहत मिलती है और पर्यावरण भी सुरक्षित रहता है।
Dhaincha Farming से कैसे होगी पैसों की बचत?
विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, ढैंचा के इस्तेमाल से प्रति हेक्टेयर लगभग छह बोरी यूरिया (करीब 1599 रुपये), डीएपी पर 700 से 750 रुपये और एमओपी पर 550 से 600 रुपये तक की बचत हो सकती है। इस तरह, सिर्फ ढैंचा को खेत में मिलाने से एक हेक्टेयर में किसानों को लगभग 3000 रुपये तक की सीधी बचत हो सकती है। यह धान की खेती की लागत कम करने का एक प्रभावी तरीका है।
अन्य फायदे और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भूमिका
लागत बचत के अलावा, ढैंचा की फसल खरपतवारों को नियंत्रित करने में भी मददगार साबित होती है। यह न केवल मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाती है, बल्कि सूक्ष्मजीवों के लिए भी आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराती है। इससे किसानों को अक्सर होने वाली उर्वरकों की कमी की समस्या से भी निजात मिलती है, जिससे उनकी खेती आसान और अधिक टिकाऊ बनती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
यह तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है, जो कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर मिट्टी स्वास्थ्य चाहते हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें







