

Farmer Registry: सरकारी योजनाएं कभी-कभी भूलभुलैया बन जाती हैं, जिसका अंतहीन रास्ता किसानों को थका देता है। जाले प्रखंड में कुछ ऐसा ही मंजर देखने को मिल रहा है, जहां अन्नदाताओं के लिए लागू की गई एक व्यवस्था ही उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गई है। यहां पीएम किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का लाभ जारी रखने के लिए अनिवार्य की गई फार्मर रजिस्ट्री प्रक्रिया पूरी तरह से ठप पड़ गई है, जिससे हजारों किसान दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
क्यों ठप पड़ा है Farmer Registry का काम?
जाले प्रखंड क्षेत्र में यह व्यवस्था पूरी तरह बदहाली का शिकार हो चुकी है। हालात इतने गंभीर हैं कि प्रखंड के सभी राजस्व गांवों में पीएम किसान योजना का लाभ ले रहे 15,481 किसानों में से अब तक महज 2,266 किसानों की ही फार्मर रजिस्ट्री आईडी जेनरेट हो सकी है। शेष 13,000 से अधिक किसान आज भी असमंजस और परेशानियों के भंवर में फंसे हुए हैं। जिलाधिकारी ने इस काम को दो चरणों में पूरा करने का स्पष्ट निर्देश दिया था, लेकिन यह निर्देश हवा-हवाई साबित हुआ। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
जानकारी के अनुसार, कृषि समन्वयकों ने ई-केवाईसी का काम तो किया, लेकिन राजस्व कर्मियों ने तकनीकी दिक्कतों का हवाला देकर फार्मर आईडी बनाने का काम लगभग रोक दिया है। पहले कड़ाके की ठंड का बहाना बनाया गया और अब जब किसान शिविरों में पहुंच रहे हैं तो उन्हें नई-नई तकनीकी अड़चनें बताकर लौटाया जा रहा है। यह स्थिति बिहार सरकार के राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अधिकारियों की नई-नई मांगों से किसान परेशान
किसानों की मुसीबत यहीं खत्म नहीं हो रही है। जिन किसानों की जमीन पहले से दर्ज थी, उनके मामलों में केवल लगान का रकवा ऑनलाइन चढ़ाया गया, लेकिन खाता और खेसरा का विवरण दर्ज नहीं किया गया। अब ऐसे किसानों से परिमार्जन प्लस, नया और पुराना खाता-खेसरा नंबर तथा ई-मापी कराने जैसी जटिल प्रक्रियाएं पूरी करने को कहा जा रहा है, जिसका खर्च उठाना उनके लिए मुश्किल हो रहा है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
रतनपुर गांव के किसान हेमंत कुमार ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा, “शिविर में मुझसे वंशावली की मांग की गई, जबकि मैं अपने पिता का इकलौता संतान हूं। सारे कागजात देने के बाद भी पुराना खाता-खेसरा नंबर मांगा जा रहा है।” उनका कहना है कि अब उन्हें निजी अमीन से जमीन की मापी करानी पड़ रही है, जिसकी फीस पीएम किसान की सालाना छह हजार रुपये की राशि से भी ज्यादा है।
वहीं, किसान शम्भू ठाकुर ने कहा कि एक तरफ खेती का काम और दूसरी तरफ बच्चों की परीक्षाएं सिर पर हैं, ऐसे में बार-बार शिविर का चक्कर लगाना संभव नहीं हो पा रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। कई किसान, जैसे अरुण कुमार ठाकुर, ने तो अत्यधिक दौड़भाग से तंग आकर अब घर पर ही बैठ जाना बेहतर समझा है। इन हालातों ने फार्मर रजिस्ट्री अभियान की सफलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है।


