
दरभंगा, देशज टाइम्स अपराध ब्यूरो। दरभंगा जिला में पूर्व में हुए पुलिस एसोसिएशन-पुलिस मेंस एसोसिएशन के चुनाव पर प्रश्न उठना लाजमी हैं। इस चुनाव में सरकार की ओर से दिए गए आदेश निर्देश की धज्जियां उड़ाई गई। और, यहां के वरीय पुलिस पदाधिकारी मूक दर्शक बनते दिखाई दिए।
नतीजा यह हुआ कि वर्षों से जमे पुलिसकर्मियों का यहां से तबादला हुआ नहीं और उनका चुनाव भी संपन्न हो गया। और, कई स्थानांतरित पुलिस कर्मी यहां चुनाव लड़कर पद पर आसीन भी हो गए। सभी वरीय पुलिस पदाधिकारी देखते रह गये।
जानकारी के अनुसार, दरभंगा जिला बल में पुलिस मेंस एसोसिएशन-पुलिस एसोसिशन के हुए चुनाव में वरीय पुलिस पदाधिकारीयों के आदेश-निर्देश को अनदेखी कर यहां चुनाव कराया गया। यदि इस आदेश को मानकर चुनाव कराया गया होता तो वर्षों से जमे पुलिसकर्मी यहां पद धारक नहीं बनते और इनकी दबंगई यहां नहीं चलती।
कई ऐसे पद धारक हैं जिनके आगे आई जी से लेकर एसपी तक बौने दिखाई पड़ते हैं। इसी का नतीजा हैं कि डीजीपी के जिस आदेश को एसपी-आई जी को अनुपालन कराना था वह टाई टाई फिस्स हो गया।
डीजीपी 18 मार्च 21 को सभी पुलिस महानिदेशक, अपर पुलिस महानिदेशक, सभी आईजी, सभी डीआईजी, सभी वरीय पुलिस अधीक्षक, सभी पुलिस अधीक्षक समेत अन्य को भी पत्र के माध्यम से सूचित किया गया था कि पुलिस मुख्यालय के निर्देशों का अक्षरशः एवं दृढ़ता पूर्वक अनुपालन कराना सुनिश्चित कराए।
उन्होंने नियम का हवाला देते हुये कहा था कि बिहार पुलिस एक्ट 2007की धारा में सिपाही से लेकर पुलिस निरीक्षक तक की जिला अवधि छ वर्ष निर्धारित हैं अतः जिनका छह वर्ष पूरा हो गया हैं उसे जिला से स्थानांतरण किया जाय।
यही नहीं उन्होंने यह भी पत्र में कहा एसोसियेशन के अगर पुलिस एक्ट 2007की धारा -10में जिला अवधि पूर्ण कर लिये हैं तो उसी स्थान पर चुनाव की अहर्ता नहीं रखेंगे यही नहीं अगर अवधि पूर्ण होने के आधार पर इनका स्थानांतरण होता हैं तो उक्त स्थानांतरण को रोका नहीं जाएगा।
उन्होंने यह भी आदेश में कहा था कि यदि कोई कर्मी इन नियमों या प्रावधानों का उल्लंघन करता हैं या किसी सहकर्मियों को ऐसा करने के लिये उत्प्रेरित करता हैं तो ऐसे कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनिक कारवाई के साथ साथ THE Police force act 1966 की धारा 4के तहत कार्रवाई सुनिश्चित करें।
लेकिन, दरभंगा जिला बल में डीजीपी के इस आदेश को आईजी से लेकर एसपी तक दरकिनार कर दिए। कागज का हवाई जहाज चलते रहा, कभी आईजी तो कभी एसएसपी तो कभी एसपी के यहां दौड़ते रहा, लेकिन फलाफल शून्य रहा।
छह वर्ष की बात क्या करें यहां तो दस साल पंद्रह साल यहां तक की तीस तीस साल से लोग जमे हुए हैं।
लेकिन, क्या मजाल हैं कि एसपी या आईजी के स्तर पर कार्रवाई हो। डीजीपी के इस आदेश के आलोक में कई स्थानांतरित हुये पुलिस कर्मी फिर से अपना समायोजन यही करा लिये। चुनाव भी लड़े और जीत भी गये।ऐसे में क्या कहा जाय ,क्या यह कह जाय कि पुलिस अनुशासनिक विभाग हैं या फिर यह कहा जाय कि डीजीपी के आदेश को आई जी या एसपी-एसएसपी रद्दी के टोकरी में फेंककर हंसी टोली करते दिखाई पड़ते हैं।
अब ऐसे में एक सवाल हैं कि इस प्रक्षेत्र में हुए चुनाव क्या संवेधानिक हैं अगर नहीं हैं तो पूर्व में हुये चुनाव को रद्द कराना सरकार की जवाबदेही हैं यही नहीं इस आदेश का अनुपालन कराना एसपी की जवाबदेही थी लेकिन एसपी द्वारा इस जवाबदेही का अनुपालन नहीं कराया गया।
अब प्रश्न उठता हैं कि अगर एसपी द्वारा डीजीपी के आदेश का अवहेलना किया गया तो क्या उस एसपी पर कारवाई होगी या फिर पूर्व में हुये चुनाव को फिर से रद्द कर इन सभी का स्थानांतरण करने के बाद पुनः चुनाव कराया जाएगा।आईजी या एसपी इस मामले में अपना पक्ष देना नहीं चाहते। ऐसे में बिहार पुलिस में जो कुछ अनुशासन बचा हैं वह भी धूल चाटने लगेगा।








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