

International Mother Language Day: जैसे नसों में खून दौड़ता है, वैसे ही हमारी चेतना में मातृभाषा बहती है। इसी भाव को केंद्र में रखकर दरभंगा में विद्वानों ने विचारों का ऐसा मंथन किया, जिसकी गूंज दूर तक सुनाई दी।
कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग में एक भव्य संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मातृभाषा के संरक्षण, उसके संवर्धन और शैक्षिक जीवन में उसकी उपयोगिता पर एक व्यापक अकादमिक विमर्श को जन्म देना था। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक रूप से दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुई, जिसने माहौल को भक्तिमय बना दिया।
International Mother Language Day पर संगोष्ठी का आयोजन
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए विभागीय प्राध्यापक डॉ. रामसेवक झा ने अपने उद्बोधन में कहा कि मातृभाषा किसी भी व्यक्ति की पहली शिक्षक होती है। यही वो भाषा है जो उसके व्यक्तित्व, उसके विचारों और उसकी संवेदनाओं को सही आकार देती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अगर बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जाए तो उनमें आत्मविश्वास, रचनात्मकता और खुद को अभिव्यक्त करने की क्षमता का अभूतपूर्व विकास होता है।
‘मातृभाषा ही व्यक्ति की प्रथम शिक्षिका’
डॉ. झा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में मातृभाषा का महत्व रेखांकित करते हुए कहा कि जब ज्ञान अपनी भाषा में मिलता है, तो उसे ग्रहण करना बेहद सरल और प्रभावी हो जाता है। इसी क्रम में प्राध्यापिका डॉ. प्रीति रानी ने अपने संबोधन में कहा कि मातृभाषा सिर्फ बातचीत का एक जरिया नहीं है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक पहचान और गौरवशाली परंपरा की वाहक है। इस तरह के आयोजन International Mother Language Day की सार्थकता को और बढ़ाते हैं।
वैश्वीकरण के दौर में मातृभाषा की चिंता
वहीं, डॉ. निशा ने वैश्वीकरण के इस युग में मातृभाषा के प्रति बढ़ती उदासीनता पर अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “यह एक गंभीर विषय है कि आज हमारी नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर हो रही है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम सभी अपने घरों, स्कूलों और समाज में मातृभाषा के प्रयोग को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करें।” आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस विचार को आगे बढ़ाते हुए डॉ. संजीव कुमार और कुंदन कुमार ने कहा कि International Mother Language Day हमें यह स्मरण कराता है कि भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी पहचान और विरासत की आत्मा है। अपनी मातृभाषा का सम्मान करना वास्तव में अपने संस्कारों और संस्कृति का सम्मान करना है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
छात्रों ने भी रखे अपने विचार
इस अवसर पर शिक्षाशास्त्र विभाग के छात्रों ने भी अपने विचार रखे। छात्रों ने स्थानीय भाषाओं और बोलियों के संरक्षण के लिए नियमित रूप से शोध, प्रकाशन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में मातृभाषा की महत्ता को समर्पित कई कविता-पाठ भी प्रस्तुत किए गए, जिन्होंने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। एनएसएस कार्यक्रम पदाधिकारी पवन सहनी के सफल संयोजन में यह संगोष्ठी आयोजित की गई और इसका समापन सामूहिक शांतिपाठ के साथ हुआ।




