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फ़रवरी, 12, 2026
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Darbhanga Foot and Mouth Disease: जाले में कहर बरपा रहा खुरहा-मुंहपक्का रोग, पशुपालक त्राहिमाम!

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Foot and Mouth Disease: काल बनकर मंडरा रही बीमारी, पशुपालकों के लिए किसी आपदा से कम नहीं है यह। मवेशियों की सांसें छीन रही यह महामारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ने लगी है। बिहार के जाले प्रखंड में इन दिनों Foot and Mouth Disease (खुरहा-मुंहपक्का) रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है, जिसने पशुपालकों की रातों की नींद हराम कर दी है।

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खुरहा-मुंहपक्का (Foot and Mouth Disease) रोग का बढ़ता कहर

जाले प्रखंड के विभिन्न पंचायतों में दुधारू पशु खुरहा-मुंहपक्का (एफएमडी) रोग की चपेट में आ रहे हैं। इस भयानक पशु रोग के कारण कई पशुओं की मौत हो चुकी है, जिससे पशुपालकों में दहशत का माहौल है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। पशुपालक स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर आक्रोशित भी हैं।

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स्थानीय पशुपालक प्रेम कुमार धीर ने बताया कि उनकी चार गायें पिछले एक सप्ताह से बीमार हैं। वह लगातार प्राथमिक वर्गीय पशु अस्पताल जाले जाते रहे, लेकिन वहां ताला लटका मिला। अस्पताल का कोई संपर्क नंबर भी उपलब्ध नहीं है, जिससे इलाज कराना मुश्किल हो गया है। जाले हाट के शत्रुघ्न साह, देव नारायण साह, देवू साह और राघोपुर के किसान सोगारथ यादव जैसे कई अन्य पशुपालकों ने भी बताया कि अस्पताल बंद होने के कारण उन्हें निजी चिकित्सकों से इलाज कराना पड़ा, लेकिन पशुओं की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।

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पशुपालकों ने जिला प्रशासन और पशुपालन विभाग से गुहार लगाई है कि जाले स्थित पशु अस्पताल को नियमित रूप से खोला जाए और क्षेत्र में तत्काल मेडिकल टीमें भेजकर इस महामारी पर नियंत्रण पाया जाए। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए त्वरित कार्रवाई की मांग उठ रही है।

पशु चिकित्सक का पक्ष और जमीनी हकीकत

इस संबंध में पशु चिकित्सक डॉ. शिवेंद्र कुमार से दूरभाष पर संपर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि वह स्वयं और मोबाइल एंबुलेंस के माध्यम से विभिन्न पंचायतों में जाकर पशुओं का इलाज कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि प्रत्येक पंचायत में टीकाकरण कर्मी भी तैनात हैं। हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि कर्मियों के अभाव के चलते जब वह क्षेत्र में होते हैं, तब अस्पताल में ताला लगा रहता है। यह स्थिति अस्पताल की नियमित सेवा में बाधा उत्पन्न कर रही है और पशुपालकों को समय पर उपचार नहीं मिल पा रहा है। इस व्यवस्थागत कमी से ग्रामीण क्षेत्रों में पशुधन को भारी नुकसान हो रहा है, और पशुपालक असहाय महसूस कर रहे हैं।

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