

जाले। कृषि विज्ञान केंद्र जाले में आत्मा दरभंगा की ओर से प्रायोजित किसान वैज्ञानिक वार्ता का आयोजन हुआ। इसमें मृदा वैज्ञानिक डॉ. एपी राकेश ने बताया कि अधिक उपज प्राप्त करने के लिए उर्वरक की उचित मात्रा, उचित समय, उचित स्रोत एवं उचित स्थान पर उर्वरक प्रयोग करें।
उन्होंने कहा, ऐसा करने से लागत खर्च में कमी आती है, बल्कि इससे पर्यावरण पर दुष्प्रभाव में कमी आती है। धान की फसल में प्रयोग किए जाने वाले नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की उपयोग क्षमता क्रमशः 30 से 35%, 20 से 25% और 35 से 40% ही है।
डॉ.राकेश ने कहा, उर्वरक का उपयोग क्षमता बढ़ाने के लिए खेतों में जैविक खाद, जीवाणु खाद, हरी खाद एवं पौधे का अवशेष का प्रयोग आवश्यक है। नेत्रजन के उपयोग क्षमता को बढ़ाने के लिए नेत्रजन के 4 भाग में एक चौथाई रोपनी के समय, रोपनी के 15-20 दिनों के बाद तथा कली बनने के समय तथा इससे पूर्व एक चौथाई मात्रा को धान के बदले ढैंचा में प्रयोग करें अथवा अंतिम कदवा के समय फास्फोरस की पूरी मात्रा एवं पोटाश की तीन चौथाई मात्रा के साथ 25
किलोग्राम जिंक सल्फेट या 15 किलोग्राम चिलेटे जिंक प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। खड़ी फसल में जिंक की कमी के लक्षण दिखाई देने पर 500 ग्राम जिंक सल्फेट और ढाई सौ ग्राम चुने के घोल को 100 लीटर पानी में घोल बनाकर 10 दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव करना चाहिए।
जिंक की कमी होने पर सर्वप्रथम ऊपर से तीसरी पत्ती के आधार पर लाल भूरे रंग के धब्बे बनते हैं और धीरे-धीरे यह पूरी पत्ती को ढक लेती है। इसके कारण पौधे की बृद्धि रुक जाती है । खेतों में ज्यादा समय तक पानी लगा रहने से यह रोग तेजी से फैलता है। पोटाश की बची एक चौथाई मात्रा को गाभा के अवस्था में प्रयोग करें।
गन्धक की कमी को कम करने के लिए सिंगल सुपर फॉस्फेट ,गंधक युक्त मिश्रित उर्वरक फॉस्फोजिस्म आदि सल्फर युक्त उर्वरक का प्रयोग करना चाहिए। जिससे फसल की गुणवत्ता बढ़ती है एवं उपज में भी बृद्धि होती है।
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