

MNREGA Scheme Failure: जिस योजना को गावों की तकदीर बदलने वाला बताया गया, आज वही योजना मजदूरों के लिए ‘मृगतृष्णा’ बन गई है। कुशेश्वरस्थान पूर्वी में मनरेगा की सांसें उखड़ रही हैं और मजदूर रोजी-रोटी के लिए महानगरों की ओर भागने को मजबूर हैं।
MNREGA Scheme Failure की यह ताजा तस्वीर दरभंगा के कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड से सामने आई है, जहां महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) पूरी तरह से ठप पड़ गई है। इस योजना के बंद होने से क्षेत्र के गरीब और जरूरतमंद मजदूरों के सामने रोजगार का गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। स्थिति इतनी विकट हो गई है कि प्रखंड के अधिकांश मजदूर अपने परिवार का पेट पालने के लिए दिल्ली, पंजाब, और गुजरात जैसे महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि बीते कई महीनों से प्रखंड में मनरेगा के तहत कोई भी नई योजना शुरू नहीं की गई है। जो योजनाएं पहले से स्वीकृत थीं, वे भी अधर में लटकी हुई हैं। मजदूर लगातार काम की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। नतीजतन, उनके लिए परिवार का भरण-पोषण करना भी मुश्किल हो गया है।
क्यों हुआ MNREGA Scheme Failure, जानिए पूरी कहानी
मनरेगा योजना को ग्रामीण अर्थव्यवस्था और ग्रामीण रोजगार की रीढ़ माना जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण मजदूरों को उनके ही गांव में साल में कम से कम सौ दिनों का रोजगार उपलब्ध कराना है, ताकि पलायन को रोका जा सके। लेकिन कुशेश्वरस्थान पूर्वी प्रखंड में यह योजना अपने उद्देश्यों से पूरी तरह भटक चुकी है। मजदूरों का सीधा आरोप है कि प्रशासनिक उदासीनता और लापरवाही के कारण काम पूरी तरह से बंद है।
पहले इसी योजना के तहत तालाब की खुदाई, सड़कों की मरम्मत, मिट्टी भराई और नाला निर्माण जैसे कई कार्य होते थे, जिससे स्थानीय स्तर पर ही लोगों को काम मिल जाता था। अब काम बंद होने से मजदूर दिनभर खाली बैठने या फिर पलायन की सोचने को विवश हैं। कई परिवारों के सामने तो दो वक्त की रोटी का संकट भी खड़ा हो गया है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। इस स्थिति पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी गहरी चिंता व्यक्त की है।
अधिकारियों के गोलमोल जवाब, अधर में लटका मजदूरों का भविष्य
जब इस मामले पर मुखिया संघ के अध्यक्ष छेदी राय से बात की गई, तो उन्होंने बताया कि काम बंद रहने से मानव दिवस का सृजन नहीं हो रहा है, जिससे मजदूर पलायन कर रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जब रोजगार सेवक से योजना पर डिमांड लगाने के लिए कहा जाता है, तो वह मनरेगा पीओ (कार्यक्रम पदाधिकारी) द्वारा टालमटोल करने की बात कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
वहीं, जब मनरेगा पीओ अबुल कलाम से संपर्क किया गया तो उन्होंने एक हैरान करने वाला जवाब दिया। उन्होंने कहा, “अब तक मेरे पास कोई फाइल नहीं आई है और न ही कोई साइट दिखाई गई है। जब तक इनमें से कुछ नहीं होता, मैं कोई योजना कैसे चला सकता हूं?” अधिकारियों के इस गोलमोल जवाब के बीच, सवाल यह है कि मजदूरों के भविष्य का क्या होगा? प्रशासन इस गंभीर समस्या पर कब कोई ठोस कदम उठाएगा, यह देखने वाली बात होगी। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।


