School Education: विद्यालय महज ईंट-गारे की इमारत नहीं, बल्कि वह पवित्र भूमि है जहां देश के भविष्य की नींव रखी जाती है। यह एक ऐसी प्रयोगशाला है, जहां केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि जीवन के अहम संस्कार गढ़े जाते हैं। आज का समय केवल परीक्षा-केंद्रित शिक्षा का नहीं, बल्कि चरित्र-निर्माण और सामाजिक उत्तरदायित्व का है। यदि कोई शिक्षण संस्थान बच्चों को केवल अंक दिलाने तक सीमित रह जाए, तो वह अपनी मूल भूमिका से भटक जाता है। शिक्षा का असली उद्देश्य केवल नौकरी प्राप्त करना नहीं, बल्कि संवेदनशील और जागरूक नागरिक तैयार करना होना चाहिए।
दरभंगा के अलीनगर प्रखंड स्थित आईडियल पब्लिक विद्यालय के निदेशक अरुण सिंह ने हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान इस बात पर जोर दिया कि सामाजिक परिवेश में स्थित विद्यालयों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उनके अनुसार, यहाँ शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहती, बल्कि एक जीवन-शैली का रूप लेती है। जब बच्चे विद्यालय परिसर में स्वच्छता, वृक्षारोपण, जल-संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मूल्यों और अनुशासन को व्यवहार में देखते हैं, तभी वे उसे अपने जीवन में आत्मसात कर पाते हैं।श्री सिंह ने स्पष्ट किया कि बीते कुछ वर्षों में यह बात सामने आई है कि पर्यावरण संकट से निजात केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि जन-चेतना से ही मिल सकती है। इसी सोच के साथ विद्यालयों को ‘हरित प्रयोगशाला’ के रूप में विकसित करना समय की मांग है। जब बच्चे स्वयं अपने हाथों से पौधा लगाते हैं, उसकी देखभाल करते हैं, और उसे बढ़ते देखते हैं—तब उनके भीतर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का बीज स्वतः ही अंकुरित होता है। यह सिर्फ पर्यावरण शिक्षा नहीं, बल्कि समग्र छात्र विकास का अभिन्न अंग है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में बच्चों को यह सिखाना नितांत आवश्यक है कि सफलता केवल प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन और संयम से मिलती है। शिक्षा के साथ संस्कार, स्वास्थ्य और संयम का संतुलन अत्यंत आवश्यक है। यदि विद्यालय बच्चों को सही दिशा और मूल्य दे दें, तो समाज को सही दिशा स्वयं ही मिल जाती है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
विद्यालयी शिक्षा: चरित्र निर्माण की बुनियाद
वर्ष 2025–26 शिक्षा के क्षेत्र में आत्ममंथन का एक महत्वपूर्ण काल है। हमें यह तय करना होगा कि हम केवल डिग्रीधारी युवा तैयार करना चाहते हैं या जिम्मेदार, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक। उत्तर स्पष्ट है—इन दोनों का संतुलन ही किसी भी राष्ट्र की असली पूंजी होती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
शिक्षा का व्यापक उद्देश्य: डिग्री से आगे जिम्मेदारी
अंततः, शिक्षा तभी एक जन-आंदोलन का रूप लेती है जब विद्यालय समाज से गहराई से जुड़ता है और समाज विद्यालय पर पूरा भरोसा करता है। यह आंदोलन ही वास्तव में भविष्य का निर्माण करता है और एक सशक्त राष्ट्र की नींव रखता है।







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