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जनवरी, 1, 2026

विश्वभर में युवा सांसदों की संख्या 2% से भी कम, सहभागिता या उपेक्षा

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लनामिवि दरभंगा में आज विश्वविद्यालय राजनीति विज्ञान विभाग में विश्व मानवाधिकार दिवस के अवसर पर “मानवाधिकार और युवा विकास” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन विभागाध्यक्ष प्रो. मुनेश्वर यादव की अध्यक्षता में किया गया।

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अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विभागाध्यक्ष प्रो. मुनेश्वर यादव ने कहा, “वैश्विक शांति के लिए युवाओं में नवीनता, रचनात्मकता और मुखरता का होना जरूरी है। यह तभी संभव होगा, जब उनके मानवाधिकार सुनिश्चित किए जाएंगे।”

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बतौर मुख्य अतिथि सह कला संकायाध्यक्ष प्रो. चंद्रभानु प्रसाद सिंह ने मानवाधिकारों के व्यावहारिक पक्ष पर बल देते हुए कहा, “मानवाधिकारों की सैद्धांतिक चर्चा अब बौद्धिक विलासिता का रूप ले चुकी है। हमें इसकी व्यवहारिकता पर ध्यान देना होगा, ताकि प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा को स्थापित किया जा सके।”

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विभाग के वरीय आचार्य प्रो. मुकुल बिहारी वर्मा ने भारत के आर्थिक विकास और मानव विकास पर अपनी बात रखते हुए कहा, “भारत आर्थिक क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन मानव विकास के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जब हम इन दोनों में संतुलित प्रगति करेंगे, तभी भारत एक विकसित राष्ट्र के रूप में विश्व पटल पर स्थापित हो पाएगा।”

मिथिला विश्वविद्यालय के उप-परीक्षा नियंत्रक (तकनीकी व व्यावसायिक शिक्षा) सह विभागीय प्राध्यापक डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि “विश्वभर में युवा सांसदों की संख्या 2% से भी कम है, जो मानवाधिकारों में युवाओं की सहभागिता के उपेक्षित पहलू को दर्शाता है। स्वतंत्रता दी नहीं जाती, बल्कि उसे जीता जाता है और न्याय भी वसूला जाता है।”

शोधार्थी आशुतोष कुमार पांडे ने मानवाधिकारों के उ‌द्भव और विकास पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने लॉक और हॉब्स की प्राकृतिक अधिकारों की अवधारणा पर चर्चा करते हुए यूडीएचआर 1948 की प्रासंगिकता पर विचार रखे।

छात्रा समारा खान ने युवाओं के मानवाधिकारों पर चर्चा करते हुए कहा, “युवाओं के मानवाधिकार का तात्पर्य मौलिक अधिकारों और स्वतंत्रता का पूर्ण आनंद लेने से है।”
मंच संचालन सहायक आचार्य रघुवीर कुमार रंजन ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी अनूप कुमार ने किया। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में छात्र, शोधकर्ता और शिक्षक उपस्थित रहे।

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