Somnath Temple News: आस्था का अटूट धागा, जो सदियों की आंधियों में भी नहीं टूटा, एक बार फिर मिथिला की धरती पर अपनी दिव्यता बिखेर रहा है। कुशेश्वरनाथ महादेव मंदिर में सोमनाथ स्वाभिमान पर्व पर विशेष पूजा-अर्चना के साथ, सनातन धर्म के शौर्य और अडिग विश्वास का उद्घोष हुआ।
सोमनाथ मंदिर स्वाभिमान पर्व: आस्था का पुनर्जागरण
बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद के आह्वान पर, मिथिला के सुप्रसिद्ध तीर्थस्थल कुशेश्वरनाथ महादेव मंदिर में एक अनूठा और गौरवशाली आयोजन हुआ। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के शुभ अवसर पर मंदिर के पंडा समाज और न्यास समिति के सदस्यों ने मिलकर रुद्राभिषेक और जलाभिषेक कर विशेष पूजा-अर्चना की। यह आयोजन मात्र एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन आस्था के पुनर्जागरण का प्रतीक था।
न्यास समिति के सदस्य संतोष पोद्दार ने इस विशेष पूजा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका उद्देश्य केवल गुजरात या सोमनाथ तक सीमित न होकर पूरे देश में, विशेष रूप से बिहार में, आध्यात्मिक चेतना का एक सामूहिक उत्सव बन जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर अनेकों बार आक्रमण हुए, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। लेकिन हमारी सनातन आस्था कभी भी डगमगाई नहीं।
पोद्दार ने आगे कहा कि हर चुनौती के बाद भारत की सांस्कृतिक एकता और अधिक सुदृढ़ हुई और सोमनाथ मंदिर का बार-बार भव्य पुनरुद्धार होता रहा। आज सोमनाथ हमारे स्वाभिमान, शौर्य और अखंड आस्था का जीवंत प्रतीक बनकर खड़ा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह हमें हमारी जड़ों और गौरवशाली इतिहास से जोड़ता है।
इस ऐतिहासिक अवसर पर न्यास कमेटी के कोषाध्यक्ष कविता कुमारी, सदस्य संतोष पोद्दार, शंकर चौपाल, छेदी कुमार राय, ज्योतिष राज, मंदिर के पुजारी पंडा रणजीत झा उर्फ बाली झा, रोशन कुमार झा, सरोज झा, संतोष झा और अमित पोद्दार सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
### मिथिला की भूमि से गूंजा सनातन का संदेश
इस आयोजन ने न केवल स्थानीय लोगों में बल्कि पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह का संचार किया। कुशेश्वरनाथ धाम का यह आयोजन यह दर्शाता है कि कैसे प्राचीन परंपराएं और आधुनिक चेतना एक साथ मिलकर समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। इस तरह के पर्व लोगों को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने और अपनी आध्यात्मिक चेतना को मजबूत करने का अवसर प्रदान करते हैं। यह आयोजन भविष्य में भी ऐसे ही धार्मिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बनते रहेंगे।


