

झंझारपुर समाचार: बिहार के झंझारपुर अनुमंडल स्थित ननौर गांव का दुर्गा मंदिर प्रांगण बुधवार को एक ऐसे साहित्यिक अनुष्ठान का गवाह बना, जहां प्रशासनिक सेवा से सेवानिवृत्त एक अधिकारी ने अपनी कलम से प्राचीन कथाओं को नया जीवन दे दिया। क्या थी वह खास कृति और क्यों इस लोकार्पण समारोह ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा? जानने के लिए पढ़ें पूरी खबर।
सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी पंडित दयानंद झा द्वारा रचित पुस्तक 'पंचतंत्र-सार' का ननौर गांव में गणमान्य अतिथियों की उपस्थिति में भव्य लोकार्पण किया गया। यह कृति बहुचर्चित 'पंचतंत्र' कथाओं का मैथिली अनुवाद है, जिसकी खास बात यह है कि इसे छंदबद्ध रूप में प्रस्तुत किया गया है। पंडित झा ने प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद साहित्य सृजन में अपनी अनवरत यात्रा को इस पुस्तक के माध्यम से एक नई दिशा दी है।
साहित्य और प्रशासन का संगम
लोकार्पण समारोह का आयोजन सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी विवेकानंद झा की अध्यक्षता में और युवा कवि सह शिक्षक आनंद मोहन झा के कुशल संचालन में हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक गोसाउनिक गीत से हुई, जिसके बाद मिथिला की गरिमामयी परंपरा के अनुसार आगंतुक अतिथियों का पाग, दोपटा और पुष्पमाल से भव्य स्वागत किया गया। यह अवसर साहित्य, संस्कृति और समाज के गणमान्य हस्तियों के मिलन का प्रतीक बन गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व कुलपति डॉ. शशिनाथ झा उपस्थित थे, जबकि विशिष्ट अतिथियों में प्रो. (डॉ.) संजीत झा सरस, आकाशवाणी के उद्घोषक मणिकांत झा और समाजसेविका सह भाजपा नेत्री सुलेखा झा शामिल थीं। स्वागत उद्बोधन देवेंद्र झा 'दीन' द्वारा दिया गया, जिन्होंने उपस्थित सभी महानुभावों का हार्दिक अभिनंदन किया।
'पंचतंत्र-सार': छंदबद्ध अनुवाद की उपादेयता
लोकार्पित पुस्तक 'पंचतंत्र-सार' पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुए डॉ. संजीत झा सरस ने इसके साहित्यिक महत्व और अनुवाद की बारीकियों पर चर्चा की। वहीं, मुख्य अतिथि डॉ. शशिनाथ झा ने अनूदित पुस्तक के छंद विधान की उपादेयता और उसके सांस्कृतिक प्रभावों पर अपना मंतव्य विस्तारपूर्वक रखा, जिससे श्रोतागण मंत्रमुग्ध हो गए।
पूर्व आईएएस अधिकारी विवेकानंद झा ने लेखक दयानंद झा के प्रशासकीय व्यक्तित्व और उनके अनुशासनबद्ध जीवन पर प्रकाश डाला, जो साहित्य सृजन में भी परिलक्षित होता है। मणिकांत झा ने लेखक की रचना प्रक्रिया और उनके समर्पण को रेखांकित करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी ज्ञान और कला के प्रति अपने प्रेम को जीवित रखा है।
इस साहित्यिक समागम में डॉ. जयानंद मिश्र, डॉ. शैलेंद्र मोहन मिश्र और प्रदीप पुष्प जैसे वक्ताओं ने भी अपने बहुमूल्य विचार प्रस्तुत किए, जिससे कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ गई। अंत में, मिहिर झा द्वारा धन्यवाद ज्ञापन किया गया, जिसमें उन्होंने सभी अतिथियों, आयोजकों और उपस्थित जनसमूह के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर गुलाब झा, विकास झा, हितो झा, अभिनव, वेदानंद, कपिंद्र झा के साथ ही दुर्गा घर के पुजारी समेत कई ग्रामीण उपस्थित थे, जिन्होंने इस साहित्यिक पहल को अपना समर्थन दिया। यह आयोजन झंझारपुर के साहित्यिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुआ।



