
मधुबनी का सरौनी पुनर्वास, जहां एक तरफ देश में आपदा का समय चल रहा है। वहीं, हम बिहार वाले आपदा में भी अवसर की खोज करना बखूबी जानते हैं।
मधुबनी के सरकारी अस्पताल में बरसों से इलाज नहीं हुआ तो मधुबनी के लोगों ने चाय-पकौड़े की दुकान खोल ली। हद तो तब हुआ जब लोगों को यह आइडिया भी नहीं है कि यह चाय-पकौड़े की दुकान नहीं मरीजों काे बेहतर हेल्थ मुहैया कराने वाली जगह जिसको अंग्रेजी के शब्दकोष में हॉस्पीटल से पहचाना जाता हैं।
ना तो कोई डॉक्टर है यहां ना ही कोई मरीज़ है, तो बस चाय-पकौड़े की दुकान और बंद पडे़ कमरे जहां कोई झांकता भी नहीं। खैर, हम बिहार वाले हैं, हमें आपदा को अवसर में बदलना आता है साहेब। भले यहां स्वास्थ्य सिस्टम या बेहतर जिंदगी की बात ना हो, कम से कम पेट भरने लायक चाय-पकौड़ा तो है…?