पग-पग पोखर, मांछ (मछली) और मखान के लिए चर्चित मिथिलांचल के विश्व प्रसिद्ध उत्पाद मखाना को भारत सरकार से जीआई टैग मिल गया है। भारत सरकार की ओर से मखाना को जीआई टैग मिलने के बाद उत्पादक किसानों ने खुशी की लहर फैल गई है तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाजार दस गुना से अधिक बढ़ने की संभावना है।
मिथिलांचल के किसानों के सपनों को उड़ान देने में अहम मखाना को आखिरकार भारत सरकार की ओर से जीआई टैग मिल गया। केंद्र सरकार ने मिथिला मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैग से सम्मानित किया है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने ट्वीट कर कहा कि मिथिला मखाना जीआई टैग में पंजीकृत हो गया है। इससे मिथिला क्षेत्र के पांच लाख किसानों को लाभ मिलेगा और कमाई भी अधिक हो सकेगी।

केंद्र ने मिथिला के मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग (Geographical Indication Tag) दे दिया है। इससे मखाना उत्पादकों को काफी फायदा होगा। इससे उन्हें उनके उत्पाद के बेहतर दाम मिल पाएंगे। मिथिला के मखाने दुनिया भर में मशहुर हैं. इसमें काफी मात्रा में प्रोटीन होता है। भारत के 90% मखाना का उत्पादन मिथिला से होता है। इससे पहले भी बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव खाजा, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और भागलपुर के जर्दालू आम को जीआई टैग दिया जा चुका है।
जीआई टैग से पंजीकृत हुआ मिथिला मखाना, किसानों को मिलेगा लाभ और आसान होगा कमाना। यह ऐसी फसल है, जिसे पानी में उगाया जाता है। मखाने में करीब 9.7 ग्राम प्रोटीन और 14.5 ग्राम फाइबर होता है। यह कैल्शियम का बहुत अच्छा स्रोत है। जीआई टैग से पहले किसी भी सामान की गुणवत्ता, उसकी क्वालिटी और पैदावार की अच्छे से जांच की जाती है। यह तय किया जाता है कि उस खास वस्तु की सबसे अधिक और ओरिजिनल पैदावार उसी राज्य की ही है।
आंकड़ा के अनुसार बिहार में प्रतिवर्ष एक लाख टन बीज मखाना का उत्पादन होता है, जिसमें से 40 हजार टन लावा प्राप्त होता है। लंबे समय से बिहार के मिथिलांचल में बड़े स्तर पर इसकी खेती होती है तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की ओर से दरभंगा में राष्ट्रीय मखाना शोध संस्थान की स्थापना के बाद मखाना की खेती मिथिलांचल से निकलकर सीमांचल और अंग प्रदेश तक पहुंच चुकी है।
मौजूदा समय में बिहार के मखाना प्रति वर्ष एक हजार करोड़ का कारोबार करता है तथा मिथिला के मखाना की मांग भारत के विभिन्न हिस्सा ही नहीं, अमेरिका, आस्ट्रेलिया, यूरोप, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान तक है। जीआई टैग मिलने से अब किसानों को अपने द्वारा उत्पादित मखाना विदेश भेजने में अधिक परेशानी नहीं होगी।
उम्मीद है कि भारत सरकार से जीआई टैग मिलने के बाद कारोबार में दस गुना तक की वृद्धि होगी और कारोबार दस हजार करोड़ को पार कर जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाजार मिलेगी, बड़ी-बड़ी कंपनियां मिथिला का रूख करेगी तो लाखों किसानों को फायदा होगा।
जैविक, ग्लूटेन मुक्त और पोषण मूल्य के कारण सुपरफूड मखाना एक औषधि की तरह है। जिसमें 78 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट और दस प्रतिशत प्रोटीन सहित कई खनिजों से समृद्ध है। मिथिला के किसान पारंपरिक फसलें छोड़कर मखाना की खेती अपना रहे हैं। मखाना उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बिहार सरकार पहले से ही फ्री में बीज और खेती के अनुदान दे रही है, जीआई टैग मिलने से अब बड़ी संख्या में किसानों का रुझान इस ओर जाएगा।
कृषि अनुसंधान परिषद के मखाना शोध संस्थान के एक अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि यदि किसान केवल मानसून की बारिश पर निर्भर रहें, तब भी मखाना की खेती लाभदायक हो सकती है। बिहार सरकार भी मखानख की खेती को बढ़ावा दे रही है। परंपरागत रूप से मखाना को तालाब एवं नम जमीन में बोया जाता था, लेकिन अब तराई क्षेत्रों को भी मखाना उत्पादन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, मखाना की करीब 60 प्रतिशत बुआई अब तराई क्षेत्र में हो रही है। खेती-किसानी से जुड़े विशेषज्ञों की मानें तो हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की अनिश्चितता से परंपरागत खेती में लाभ कम रहा है। ऐसे में किसान अपने निचली जमीन पर मखाना की खेती करें तो यह उनके आर्थिक समृद्धि के लिए वरदान साबित हो सकता है।
उल्लेखनीय है कि मखाना को जीआई टैग दिलाने के लिए बिहार सरकार बीते कुछ वर्षों से प्रयास कर रही थी। लेकिन पिछले वर्ष बिहार सरकार ने इसे बिहार मखाना का नाम देकर जीआई टैग दिलाने की कोशिश की, जबरदस्त विरोध होने पर बिहार सरकार को चुप रहना पड़ा। अब नरेन्द्र मोदी की नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने मिथिलांचल के किसानों के सपनों को उड़ान देने में अहम भूमिका रखने वाले मिथिला मखाना को जीआई टैग दे दिया।

