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फ़रवरी, 18, 2026
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मुजफ्फरपुर में अन्नदाताओं की बेबसी: सरकारी सुस्ती से ‘पलायन’ कर रहा धान, दूसरे राज्य हो रहे मालामाल

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मुजफ्फरपुर न्यूज़: बिहार का मुजफ्फरपुर, जहां अन्नदाता आज गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। खेतों से सिर्फ मजदूर ही नहीं, बल्कि मेहनत से उपजाया गया धान भी ‘पलायन’ कर रहा है। सरकारी सुस्ती और बिचौलियों के मायाजाल में फंसकर किसान अपनी उपज कौड़ियों के भाव बेचने को मजबूर हैं, जिसका सीधा लाभ दूसरे राज्यों के व्यापारी उठा रहे हैं।

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इस समय मुजफ्फरपुर के धान किसान एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। फसल तैयार है, लेकिन बेचने के लिए कोई उचित प्लेटफॉर्म नहीं मिल पा रहा है। कटाई के बाद उन्हें अपनी फसल तुरंत बेचनी होती है ताकि अगली बुवाई की तैयारी कर सकें और कर्ज़ चुका सकें, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने उन्हें दुविधा में डाल दिया है।

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समर्थन मूल्य पर खरीद में देरी और विभागीय लापरवाही

धान खरीद के लिए सरकार द्वारा निर्धारित समर्थन मूल्य (MSP) किसानों के लिए एक जीवनरेखा है, लेकिन सरकारी तंत्र की सुस्ती के कारण इस वर्ष खरीद प्रक्रिया अभी तक शुरू नहीं हो पाई है। सहकारिता विभाग, जिस पर खरीद का दारोमदार है, उसकी लापरवाही ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। नतीजतन, किसान अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचने को विवश हैं। मंडी में सही दाम न मिलने और खरीद केंद्रों के अभाव में, वे बिचौलियों के सामने लाचार खड़े हैं। कई किसान तो लागत मूल्य भी निकालने में संघर्ष कर रहे हैं।

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पंजाब और हरियाणा के बिचौलियों की चांदी

इस स्थिति का सबसे बड़ा फायदा पंजाब और हरियाणा के बिचौलिए उठा रहे हैं। वे प्रतिदिन बड़ी संख्या में मुजफ्फरपुर से धान खरीद कर अपने राज्यों में ले जा रहे हैं। यहां से कम दाम में खरीदा गया यही धान उनके राज्यों में दोगुने भाव पर बेचा जा रहा है, जिससे उन्हें भारी मुनाफा हो रहा है। यह न केवल मुजफ्फरपुर के किसानों की आय को प्रभावित कर रहा है, बल्कि बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य से बहुमूल्य अनाज का ‘पलायन’ भी करवा रहा है। एक तरफ जहां बिहार के किसानों की कमर टूट रही है, वहीं दूसरे राज्यों के व्यापारी बिहार की कृषि उपज से मालामाल हो रहे हैं।

किसानों की उम्मीदें और आगे की राह

किसानों की मांग है कि सरकार तत्काल प्रभाव से समर्थन मूल्य पर धान की खरीद शुरू करे। खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और सहकारिता विभाग को सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया जाए, ताकि अन्नदाताओं को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल सके और अनाज का यह ‘पलायन’ रोका जा सके।

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