

Hindi Kavita Sangrah: सन्दूकची – रजनी प्रभा ने शब्दों से खोल दिए स्त्री मन के सारे ताले, पढ़कर देर तक गूंजेगी आवाज़
Hindi Kavita Sangrah: कलम जब चलती है तो स्याही नहीं, अहसास बिखरते हैं। कुछ पन्ने कोरे रह जाते हैं, और कुछ पर इतिहास लिख दिया जाता है। हिंदी साहित्य के आंगन में एक ऐसी ही दस्तक है कवयित्री रजनी प्रभा का कविता संग्रह ‘सन्दूकची’, जो महज़ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि स्त्री मन की उन परतों को खोलता है, जिन्हें सदियों से समाज की बेड़ियों ने जकड़ रखा था। यह संग्रह उस बदलाव का प्रतीक है, जहां स्त्री अब केवल काव्य की प्रेरणा नहीं, बल्कि स्वयं काव्य की रचयिता बन चुकी है।
क्यों खास है यह Hindi Kavita Sangrah?
मुजफ्फरपुर की धरती से निकली यह साहित्यिक कृति ‘सन्दूकची’ स्त्री जीवन की गहराइयों को अत्यंत मार्मिक और संवेदनशील ढंग से अभिव्यक्त करती है। यह कविता संग्रह एक ऐसा दस्तावेज़ है जो स्त्री की आंतरिक दुनिया, उसके संघर्ष, स्मृतियों और आत्मविश्वास को आवाज़ देता है। कवयित्री रजनी प्रभा ने ‘सन्दूकची’ को एक रूपक की तरह इस्तेमाल किया है। यह वही संदूकची है जो भारतीय घरों में अक्सर एक कोने में पड़ी रहती है, जिसमें स्त्री अपने पुराने कपड़े, गहने, खत और यादें सहेजती है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। प्रभा जी ने इसी साधारण प्रतीक के माध्यम से स्त्री के भीतर बसे पूरे संसार को उजागर कर दिया है।
संग्रह को पढ़ते हुए महसूस होता है कि यह उन दमित भावनाओं को आसान शब्दों में आवाज़ देता है, जो हर स्त्री के मन में उठती तो हैं, पर होठों तक आकर मौन सिसकियों में बदल जाती हैं। ये कविताएँ उस प्रेम की कहानी कहती हैं जो दांपत्य जीवन का आधार था, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के भंवर में कहीं खो गया। जैसा कि एक जगह लिखा है, “जहां से जिम्मेदारियाँ, सुकोमल भावनाओं को गाहे-बगाहे पनपा दे रही थी, मगर प्रेम और विश्वास रूपी खाद के अभाव में दाम्पत्य जीवन, गोबर होता जा रहा था।”
स्त्री जीवन की अनकही परतों का दस्तावेज़
‘सन्दूकची’ की कविताएँ प्रेम, मातृत्व, वियोग, समाज, प्रकृति और आत्मान्वेषण जैसे विविध विषयों को अपने में समेटे हुए हैं, लेकिन इन सबके केंद्र में स्त्री है। वह कभी माँ है, कभी प्रेमिका, कभी पत्नी और इन सबसे ऊपर एक स्वतंत्र चेतना वाली इंसान है। संग्रह में स्त्री चेतना का स्वर बेहद संतुलित और गहरा है। कवयित्री सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाती हैं, लेकिन उनका अंदाज़ विद्रोही होते हुए भी विनम्र है।
एक कविता की पंक्ति है, “क्या जरूरी है कि, सदियों से चले आ रहे कृत्रिम ढर्रे पर ही हम भी चलें और उसी बेजान पड़े तराज़ू पर तौलें अपना प्रेम?” यह पंक्ति केवल सामाजिक रीति-रिवाजों पर प्रहार नहीं करती, बल्कि सड़ांध मारती रूढ़ियों से बाहर निकलकर जीवन में नयापन लाने की पैरवी करती है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। रजनी प्रभा की कविताएं स्त्री को केवल विरोध की आवाज़ नहीं, बल्कि एक संवेदनशील व्यक्तित्व के रूप में देखती हैं, जो जीवन की आपाधापी में खोए हुए प्रेम को तलाश रही है।
सहज भाषा में गहरी संवेदना
रजनी प्रभा की भाषा की सबसे बड़ी खूबी उसकी सहजता और आत्मीयता है। उन्होंने कृत्रिम अलंकारों या छंदों का सहारा नहीं लिया, बल्कि लोकजीवन की गंध से अपनी कविताओं को महकाया है। उनकी पंक्तियाँ छोटी हैं, मगर गहरे अर्थ समेटे हुए हैं। शैली के स्तर पर प्रतीकात्मक और संवादात्मक प्रयोग कविताओं को पाठक के दिल के करीब ले जाता है।
कवयित्री की दृष्टि केवल स्त्री तक सीमित नहीं है। वे पुरुष को केवल ‘शोषक’ के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उसे भी सामाजिक संरचनाओं का शिकार मानती हैं। उनकी कविताओं में पुरुष एक सहभागी और संवेदनशील व्यक्ति के रूप में भी चित्रित है। यह संग्रह इस बात का प्रमाण है कि कविता का उद्देश्य केवल सौंदर्य का बखान करना नहीं, बल्कि समाज को जगाना भी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। कुल मिलाकर, ‘सन्दूकची’ रजनी प्रभा की रचनात्मक परिपक्वता का प्रमाण है, जिसका स्वर पाठकों के मन में देर तक गूंजता रहेगा।



