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फ़रवरी, 17, 2026
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सफाईकर्मियों के आउटसोर्सिंग रेट पर अब विभाग का नियंत्रण, नगर निगमों से अधिकार वापस

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मुजफ्फरपुर न्यूज़: अब तक सफाई कर्मियों के आउटसोर्सिंग रेट तय करने का अधिकार सीधे नगर निगमों के हाथ में था। लेकिन, अब यह व्यवस्था हमेशा के लिए बदलने वाली है। राज्य के शहरी विकास विभाग ने एक ऐसा मॉडल आरएफपी (Request for Proposal) जारी किया है, जिसके बाद नगर निगमों की मनमानी पर लगाम लगेगी और एकरूपता आएगी। आखिर क्या है यह नया नियम और क्यों उठाई गई यह बड़ी पहल?

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राज्य सरकार के शहरी विकास विभाग ने सफाई कर्मियों की आउटसोर्सिंग से संबंधित एक महत्वपूर्ण मॉडल आरएफपी जारी किया है। इस नए मॉडल के लागू होने के बाद, नगर निगम अब सीधे तौर पर सफाई कर्मियों के लिए आउटसोर्सिंग दरों का निर्धारण नहीं कर पाएंगे। यह कदम पूरे राज्य में सफाई व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने और इसमें पारदर्शिता लाने की दिशा में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

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क्या है मॉडल आरएफपी?

मॉडल आरएफपी (Request for Proposal) मूल रूप से एक मानक निविदा दस्तावेज होता है, जिसे कोई विभाग या सरकारी संस्था जारी करती है। इसका उद्देश्य किसी विशेष सेवा या परियोजना के लिए प्रस्ताव आमंत्रित करना होता है। इस मामले में, यह आरएफपी सफाई सेवाओं के लिए ठेका देने वाली एजेंसियों के लिए एक समान नियम और शर्तें निर्धारित करेगा, जिसमें विशेष रूप से आउटसोर्सिंग किए गए सफाई कर्मियों को भुगतान की जाने वाली दरों का मानकीकरण शामिल है।

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पहले, प्रत्येक नगर निगम अपनी आवश्यकता और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आउटसोर्सिंग दरों का निर्धारण करता था। इस प्रक्रिया में अक्सर मनमानी और विभिन्न निगमों में दरों की असमानता देखने को मिलती थी। नए मॉडल आरएफपी के जरिए विभाग ने इन विसंगतियों को दूर करने और एक पारदर्शी एवं न्यायसंगत व्यवस्था स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।

क्यों लिया गया यह फैसला?

यह निर्णय मुख्य रूप से सफाई सेवाओं में एकरूपता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। अलग-अलग निगमों द्वारा तय की जाने वाली दरों के कारण ठेकेदारों और सफाई कर्मियों के बीच वेतन और सुविधाओं को लेकर अक्सर भ्रम की स्थिति रहती थी। विभाग का मानना है कि एक केंद्रीकृत मॉडल आरएफपी से न केवल प्रक्रिया सरल होगी, बल्कि ठेका देने में लगने वाले समय में भी कमी आएगी।

इसके अलावा, यह कदम भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम करने में भी सहायक हो सकता है। जब दरें विभाग द्वारा निर्धारित होंगी, तो स्थानीय स्तर पर मोलभाव या अनुचित लाभ लेने की गुंजाइश कम हो जाएगी। यह सुनिश्चित करेगा कि सरकार द्वारा आवंटित धन का उपयोग अधिक कुशलता और ईमानदारी से हो।

नगर निगमों पर क्या होगा असर?

इस फैसले से नगर निगमों की कुछ हद तक स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है, खासकर आउटसोर्सिंग दरें तय करने के मामले में। हालांकि, उन्हें अब दरों को लेकर कोई विशेष निर्णय नहीं लेना होगा, जिससे उनके प्रशासनिक कार्यभार में कमी आ सकती है। निगमों को अब केवल विभाग द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों का पालन करना होगा।

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यह बदलाव निगमों को सफाई सेवाओं की गुणवत्ता और निगरानी पर अधिक ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है, बजाय इसके कि वे वित्तीय पहलुओं पर समय और संसाधन खर्च करें। एक समान दर प्रणाली से पूरे राज्य में सफाई कर्मचारियों के लिए समान अवसर और सेवा शर्तें भी सुनिश्चित हो सकती हैं।

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सफाई कर्मियों के लिए मायने

सफाई कर्मियों के लिए यह कदम कई सकारात्मक बदलाव ला सकता है। एक मानकीकृत आउटसोर्सिंग दर का मतलब यह हो सकता है कि उन्हें अब बेहतर और अधिक स्थिर मजदूरी मिले। पहले, ठेकेदार अक्सर दरों में अंतर का फायदा उठाकर कर्मियों को कम भुगतान करते थे।

इसके अलावा, यह मॉडल आरएफपी सफाई कर्मियों के अधिकारों और सेवा शर्तों को लेकर अधिक स्पष्टता प्रदान कर सकता है। इससे उनके शोषण की संभावना कम होगी और उन्हें काम के लिए एक सम्मानजनक और उचित माहौल मिल पाएगा। यह शहरी स्वच्छता मिशन में लगे हजारों कर्मियों के लिए एक बड़ी राहत हो सकती है।

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