
Bihar Cabinet: बिहार की सियासत में सत्ता की चाबी एक बार फिर उन हाथों में है जिनके पास लंबी राजनीतिक विरासत है। हाल ही में गठित Bihar Cabinet में मंत्रियों के चयन में अनुभव से ज़्यादा राजनीतिक पृष्ठभूमि को तरजीह मिलती दिख रही है। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या बिहार में अब भी मंत्री बनने के लिए बड़े राजनीतिक घराने का ठप्पा ज़रूरी है?
पूर्व मुख्यमंत्रियों के पुत्रों का बोलबाला
मौजूदा बिहार कैबिनेट की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें तीन ऐसे चेहरे शामिल हैं जिनके पिता राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। संतोष कुमार सुमन के पिता जीतन राम मांझी बिहार के पूर्व सीएम रहे हैं। वहीं नीतीश मिश्रा के पिता जगन्नाथ मिश्रा ने तीन बार बिहार की कमान संभाली है। इन नेताओं के लिए राजनीति कोई नया मैदान नहीं है, बल्कि यह इन्हें विरासत में मिली है। सत्ता के गलियारों में इन्हें ‘सिल्वर स्पून’ पॉलिटिशियन के तौर पर देखा जाता है, जिन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए ज़मीन पर बहुत ज़्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1।
Bihar Cabinet: प्रमुख चेहरों का सियासी गणित
सिर्फ पूर्व सीएम के बेटे ही नहीं, बल्कि उप-मुख्यमंत्री और अन्य कद्दावर मंत्रियों का नाता भी पुराने सियासी घरानों से है। खुद उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के ‘भीष्म पितामह’ माने जाते रहे हैं और पूर्व मंत्री भी रहे हैं। विजय कुमार चौधरी के पिता भी कांग्रेस के पुराने और रसूखदार विधायक थे। अशोक चौधरी के पिता महावीर चौधरी भी विधायक रह चुके हैं। ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि नए Bihar Cabinet में ‘फैमिली फर्स्ट’ का फॉर्मूला काफी प्रभावी रहा है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का No.1। यह प्रवृत्ति बताती है कि बिहार की राजनीति में राजनीतिक विरासत कितनी अहम है, और अक्सर यह ज़मीनी संघर्ष पर भारी पड़ती दिखती है।







