

Bihar Financial Discipline: जब सरकार कसती है कमर, तो खजाने पर लग जाती है लगाम। बिहार में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है, जहां वित्तीय वर्ष के अंतिम चरण में एक कड़े फैसले ने प्रशासनिक गलियारों से लेकर ठेकेदारों तक हलचल मचा दी है। बिहार सरकार की ओर से एक अहम और कड़ा प्रशासनिक फैसला सामने आया है, जिसने राजनीतिक हलकों के साथ-साथ ठेकेदारों और दैनिक कामगारों के बीच भी हलचल तेज कर दी है। राज्य सरकार ने 10 मार्च तक कोषागारों से केवल स्थापना और प्रतिबद्ध व्यय के बिलों के भुगतान की अनुमति दी है। यह आदेश स्पष्ट करता है कि अब राज्य में केवल अति आवश्यक खर्चों को ही प्राथमिकता दी जाएगी, ताकि वित्तीय वर्ष के अंत में बेवजह की फिजूलखर्ची पर रोक लगाई जा सके। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इस कदम को राज्य के वित्तीय प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तौर पर देखा जा रहा है।
Bihar Financial Discipline: क्या है सरकार का नया आदेश?
सरकार के इस फैसले का सीधा असर उन सभी विभागों और व्यक्तियों पर पड़ेगा, जिनके बिल ‘स्थापना और प्रतिबद्ध व्यय’ की श्रेणी में नहीं आते हैं। विशेष रूप से, निर्माण कार्यों में लगे ठेकेदारों और विभिन्न सरकारी परियोजनाओं में काम कर रहे दैनिक कामगारों के भुगतानों में देरी होने की आशंका है। राजनीतिक गलियारों में भी इस फैसले पर बहस छिड़ गई है। विपक्ष इसे सरकार की वित्तीय कमजोरी से जोड़कर देख रहा है, जबकि सत्ता पक्ष इसे राजकोषीय नियंत्रण और पारदर्शिता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बता रहा है। यह निर्णय दर्शाता है कि सरकार इस समय खर्चों पर नकेल कसने के लिए कितनी गंभीर है।
ठेकेदारों और आम जनता पर क्या होगा असर?
आम तौर पर, वित्तीय वर्ष के अंतिम महीनों में सरकारी खर्चों में अचानक तेजी देखी जाती है। यह इसलिए होता है क्योंकि विभाग आवंटित बजट को समाप्त करने की होड़ में रहते हैं, ताकि अगले वर्ष के लिए उनके बजट आवंटन में कटौती न हो। इस जल्दबाजी में कई बार अनावश्यक और गैर-जरूरी खर्च भी हो जाते हैं। बिहार सरकार का यह कदम इसी प्रवृत्ति पर लगाम लगाने के उद्देश्य से उठाया गया है। इसका लक्ष्य है कि राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखा जाए और बेहतर वित्तीय प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सके। सरकार चाहती है कि हर एक पैसा सोच-समझकर खर्च हो, और वित्तीय अनुशासन हर हाल में बना रहे।
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‘स्थापना और प्रतिबद्ध व्यय’ में क्या-क्या शामिल?
‘स्थापना व्यय’ में मुख्य रूप से सरकारी कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और पेंशन जैसे नियमित खर्च शामिल होते हैं। वहीं, ‘प्रतिबद्ध व्यय’ में सरकार की ओर से किए गए वे वादे या समझौते आते हैं, जिनके लिए कानूनी या संविदात्मक दायित्व होता है। इसमें ऋणों का भुगतान, ब्याज भुगतान, और कुछ अनिवार्य सामाजिक कल्याण योजनाओं के भुगतान शामिल हो सकते हैं। इन श्रेणियों के अलावा अन्य सभी प्रकार के खर्चों पर 10 मार्च तक रोक लगा दी गई है। यह स्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक कि वित्तीय वर्ष की समाप्ति के लिए एक नई नीति या स्पष्टीकरण सामने नहीं आता।
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आगे क्या होगा और कब मिलेगी राहत?
अब सभी की निगाहें 10 मार्च की समय सीमा पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस अवधि के बाद क्या नई गाइडलाइन जारी करती है। उम्मीद की जा रही है कि बजट सत्र के बाद या नए वित्तीय वर्ष की शुरुआत के साथ ही अन्य भुगतानों पर लगी रोक हटाई जा सकती है। हालांकि, यह फैसला स्पष्ट संकेत देता है कि बिहार सरकार आने वाले समय में भी वित्तीय अनुशासन को अपनी प्राथमिकता में रखेगी। इस प्रकार के कड़े कदम अक्सर लंबी अवधि में राज्य की आर्थिक सेहत के लिए फायदेमंद साबित होते हैं, भले ही अल्पकालिक रूप से कुछ असुविधा हो। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह सुनिश्चित करेगा कि राज्य का वित्तीय तंत्र मजबूत और स्थिर बना रहे।

