
बिहार शराबबंदी: कुछ फैसले ऐसे होते हैं जो तलवार की दोधारी धार की तरह होते हैं – एक ओर सामाजिक उत्थान का दावा तो दूसरी ओर आर्थिक नुकसान की गहरी खाई। बिहार में पूर्ण शराबबंदी का निर्णय भी इसी द्वंद्व में फंसा है। सत्ता के गलियारों से लेकर आम जनता की चौपाल तक, हर ज़ुबान पर इसके नफे-नुकसान की बहस तेज है।
बिहार शराबबंदी: 28 से 30 हजार करोड़ का सालाना नुकसान, फिर भी टस से मस नहीं नीतीश सरकार
बिहार शराबबंदी: उपमुख्यमंत्री ने खोला आर्थिक नुकसान का ब्योरा
राज्य में जारी बहस के बीच उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि राज्य को पूर्ण शराबबंदी के चलते हर साल लगभग 28 से 30 हजार करोड़ रुपये का भारी राजस्व का नुकसान हो रहा है। इसके बावजूद, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस फैसले को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर देख रहे हैं और इसे किसी भी सूरत में वापस लेने को तैयार नहीं हैं। यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में शराबबंदी के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों पर लगातार चर्चा हो रही है।
नीतीश कुमार ने 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी। उनका तर्क था कि इससे समाज में अपराध कम होंगे और महिलाओं की स्थिति सुधरेगी। हालांकि, तब से लेकर अब तक, इस नीति के कई नकारात्मक पहलू भी सामने आए हैं, जिनमें अवैध शराब का कारोबार और जहरीली शराब से होने वाली मौतें शामिल हैं। इन घटनाओं ने राज्य सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
सरकार के भीतर ही कई नेता शराबबंदी की आर्थिक लागत को लेकर चिंता व्यक्त कर चुके हैं। उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का यह बयान इन्हीं चिंताओं को और गहरा करता है। 28 से 30 हजार करोड़ रुपये की यह आर्थिक क्षति राज्य के विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर सीधा असर डाल सकती है।
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सामाजिक बनाम आर्थिक बहस: क्या कहता है सरकार का पक्ष?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हालांकि हमेशा सामाजिक बदलाव को आर्थिक लाभ पर तरजीह दी है। उनका मानना है कि शराबबंदी ने महिलाओं को सशक्त किया है और परिवारों में शांति लाई है। उन्होंने कई मौकों पर यह भी स्पष्ट किया है कि भले ही राज्य को राजस्व का नुकसान हो रहा हो, लेकिन इस फैसले से पीछे हटने का कोई सवाल ही नहीं है।
विपक्ष और कई आर्थिक विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते रहे हैं कि शराबबंदी के बजाय, सरकार को राजस्व बढ़ाने के अन्य उपाय तलाशने चाहिए थे और साथ ही शराब के सेवन को नियंत्रित करने के लिए प्रभावी जागरूकता अभियान चलाने चाहिए थे। बिहार में शराबबंदी का भविष्य क्या होगा, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि यह मुद्दा राज्य की राजनीति और समाज के केंद्र में बना रहेगा। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

