



Bihar Liquor Ban: बिहार की सियासी ज़मीन पर शराबबंदी का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर आ गया है, जिसने सत्ता के गलियारों में नई बहस छेड़ दी है और नेताओं की बेचैनी बढ़ा दी है।
बिहार में लागू शराबबंदी कानून अब राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर नई बहस का कारण बन गया है। दिलचस्प बात यह है कि अब इस नीति को लेकर सबसे ज्यादा चिंता सत्ता पक्ष के नेताओं की ओर से ही सामने आ रही है। विधान परिषद के बजट सत्र के दौरान जब इस विषय पर चर्चा छिड़ी, तो कई सदस्यों ने इस शराबबंदी कानून के क्रियान्वयन और उसके प्रभावों पर सवाल उठाए। उनका मानना है कि कठोरता से लागू यह कानून ज़मीनी स्तर पर कई चुनौतियां खड़ी कर रहा है, जिनमें अवैध शराब का कारोबार और प्रशासनिक दबाव प्रमुख हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह केवल एक कानून नहीं, बल्कि एक सामाजिक अभियान भी है जिस पर लगातार मंथन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
Bihar Liquor Ban: सत्ता पक्ष की चिंताएं और संभावित समाधान
सत्ताधारी दल के भीतर से उठ रही आवाजें इस बात का संकेत हैं कि कानून के मौजूदा स्वरूप पर पुनर्विचार की गुंजाइश है। कई विधायकों और विधान पार्षदों ने निजी बातचीत में इस बात को स्वीकारा है कि शराबबंदी के कारण न केवल राजस्व का भारी नुकसान हो रहा है, बल्कि इससे जुड़े अपराधों में भी अपेक्षित कमी नहीं आ पाई है। इसके बजाय, यह एक समानांतर अर्थव्यवस्था को जन्म दे रहा है। नेताओं का मानना है कि इस नीति को अधिक व्यावहारिक बनाने की दिशा में सोचना होगा, ताकि इसके सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाया जा सके और नकारात्मक पहलुओं को कम किया जा सके।
कानून के अमल पर सवाल और जनभागीदारी की जरूरत
शराबबंदी कानून को लेकर आम जनता में भी मिली-जुली प्रतिक्रियाएं हैं। जहां एक वर्ग इसके पक्ष में खड़ा है, वहीं दूसरा वर्ग इसके कड़े नियमों और इसके कारण होने वाली परेशानियों से नाखुश है। अवैध शराब के कारण होने वाली मौतों और पुलिस-प्रशासन पर बढ़ते दबाव को देखते हुए, नीति निर्माताओं पर यह दबाव बढ़ रहा है कि वे जनहित में कोई ठोस कदम उठाएं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/ इस पूरी कवायद में जनभागीदारी और जागरूकता अभियान की भूमिका को भी अहम माना जा रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह केवल सरकार का नहीं, बल्कि समाज का भी दायित्व है कि इस गंभीर विषय पर गंभीरता से विचार किया जाए।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार सरकार इस बढ़ती हुई बहस और अपने ही नेताओं की चिंताओं पर क्या रुख अपनाती है। क्या शराबबंदी कानून में कोई संशोधन होगा, या इसे और प्रभावी बनाने के लिए नए उपाय किए जाएंगे? यह सवाल अब बिहार की राजनीतिक फिजा में तैर रहा है, जिसका जवाब जल्द ही मिलने की उम्मीद है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।




