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फ़रवरी, 12, 2026
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Bharat Parv 2026: दिल्ली में ‘चमका’ मिथिला का सोना, Bihar Makhana की झांकी ने लूटा मेला, विदेशों तक बढ़ी डिमांड

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Bihar Makhana: दिल्ली के मंच पर जब मिथिला का ‘मोती’ चमका, तो देखने वालों की आंखें चौंधिया गईं। लाल किले की प्राचीर के साये में सजे भारत पर्व में बिहार की झांकी ने ऐसी धूम मचाई कि हर कोई बस देखता रह गया। गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित इस छह दिवसीय महोत्सव में बिहार के मखाना को केंद्र में रखकर बनाई गई झांकी दर्शकों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण साबित हुई, जहां लोगों ने इसके साथ जमकर सेल्फी ली।Bharat Parv 2026: दिल्ली में 'चमका' मिथिला का सोना, Bihar Makhana की झांकी ने लूटा मेला, विदेशों तक बढ़ी डिमांडकेंद्रीय पर्यटन मंत्रालय द्वारा आयोजित यह प्रतिष्ठित भारत पर्व भारतीय संस्कृति, विरासत और स्थानीय उत्पादों को एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करता है। इस मंच पर मखाना की शानदार उपस्थिति यह साबित करती है कि बिहार का यह पारंपरिक उत्पाद अब केवल पूजा-पाठ या रसोई तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक सुपरफूड के तौर पर अपनी पहचान बना चुका है। मिथिला की संस्कृति और परंपरा से गहराई से जुड़ा मखाना आज पोषण, स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय खाद्य बाजार में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।Bharat Parv 2026: दिल्ली में 'चमका' मिथिला का सोना, Bihar Makhana की झांकी ने लूटा मेला, विदेशों तक बढ़ी डिमांड

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Bihar Makhana उत्पादन का गढ़ कैसे बना बिहार?

आज भारत में होने वाले कुल मखाना उत्पादन का 85 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बिहार से आता है। यह आंकड़ा बिहार को इस क्षेत्र में एकछत्र नेतृत्व प्रदान करता है। राज्य के मिथिलांचल और सीमांचल क्षेत्र इसके प्रमुख उत्पादन केंद्र हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। प्रमुख उत्पादक जिलों में शामिल हैं:

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  • दरभंगा
  • मधुबनी
  • कटिहार
  • अररिया
  • पूर्णिया
  • किशनगंज
  • सुपौल
  • मधेपुरा
  • सहरसा
  • खगड़िया

राज्य सरकार की योजनाओं, विशेष रूप से मुख्यमंत्री बागवानी मिशन और मखाना विकास योजना (2019-20), ने इस क्षेत्र को नई ऊर्जा दी है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2012 तक जहां राज्य में लगभग 13 हजार हेक्टेयर में मखाना की खेती होती थी, वहीं अब यह बढ़कर 35,224 हेक्टेयर के पार जा चुकी है। “स्वर्ण वैदेही” और “सबौर मखाना-1” जैसी उन्नत किस्मों के प्रोत्साहन से उत्पादन 56 हजार टन से अधिक हो गया है, जिसका सीधा असर किसानों की आय और राज्य की अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है।

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GI टैग और राष्ट्रीय बोर्ड से बदलेगी तस्वीर

केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय मखाना बोर्ड के गठन ने किसानों और उद्योग के बीच एक मजबूत वैल्यू चेन बनाने की उम्मीद जगाई है। इस बोर्ड का मुख्य उद्देश्य आधुनिक तकनीक, बेहतर बीज, प्रोसेसिंग यूनिट, पैकेजिंग और निर्यात को एक संगठित ढांचा प्रदान करना है। इससे किसानों को प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता मिलना भी आसान हो जाएगा। दरभंगा को एक प्रमुख प्रशिक्षण केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां अब मध्य प्रदेश जैसे अन्य राज्यों के किसान भी तकनीकी प्रशिक्षण के लिए पहुंच रहे हैं। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।’मिथिला मखाना’ को मिला GI टैग इस उत्पाद की प्रामाणिकता और ब्रांड वैल्यू को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूती देता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़ी कंपनियां मिथिला और सीमांचल क्षेत्र में निवेश करती हैं और मखाना को आधुनिक पैकेजिंग व वैश्विक मार्केटिंग से जोड़ती हैं, तो यह बिहार में रोजगार सृजन का एक बड़ा माध्यम बन सकता है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

अमेरिका तक पहुंची बिहार के मखाना की धमक

बिहार का मखाना आज अमेरिकी बाजार में भी तेजी से अपनी जगह बना रहा है। यह ग्लूटेन-मुक्त, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने के कारण इसे नट्स और पॉपकॉर्न का एक स्वस्थ विकल्प माना जा रहा है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूक वैश्विक रुझानों के बीच यह पारंपरिक भारतीय उत्पाद अब एक global सुपरफूड के रूप में स्थापित हो रहा है। भारत पर्व जैसे राष्ट्रीय मंच पर इसकी मौजूदगी सिर्फ एक कृषि उत्पाद की प्रस्तुति नहीं, बल्कि यह बिहार की सांस्कृतिक विरासत, किसानों के परिश्रम और आत्मनिर्भर भारत की सोच का प्रतीक है। मिथिला का यह ‘काला हीरा’ अब बिहार की नई पहचान बनकर दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह बना रहा है।

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