
Bihar River: अरे! ये जून नहीं, फरवरी का महीना है, लेकिन बिहार की धरती पर गर्मी का ऐसा तांडव है कि बड़ी-बड़ी नदियां भी रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही हैं। जहां कभी लहरों का शोर था, आज वहां रेत के सन्नाटे पसरे हैं। राज्य की जीवनरेखा मानी जाने वाली नदियों का जलस्तर जिस तेजी से गिर रहा है, वह आने वाले भीषण संकट का अलार्म है।
पटना। यह जून का महीना नहीं, बल्कि फरवरी है, लेकिन बिहार के कई जिलों में हालात ऐसे हैं मानो भीषण गर्मी अपने चरम पर हो। राज्य की छोटी-बड़ी नदियां तेजी से सिमट रही हैं। जहां कभी नावें चला करती थीं, वहां अब बालू के टीले नजर आ रहे हैं। नवादा से लेकर नालंदा और भभुआ से बेगूसराय तक, नदियों का जलस्तर चिंताजनक रूप से गिर चुका है। राज्य की मुख्य धमनी मानी जाने वाली गंगा नदी का जलस्तर भी कई स्थानों पर सामान्य से काफी नीचे चला गया है। बेगूसराय के सिमरिया में गंगा का जलस्तर घटकर 34.56 मीटर रह गया है। वहीं, गोपालगंज में गंडक नदी की धारा मात्र 30 से 40 मीटर में सिमट गई है, जिसमें लगभग 75 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। सासाराम क्षेत्र में सोन नदी का प्रवाह बनाए रखने के लिए सोन बराज का एक गेट खोलना पड़ा है, जहां वर्तमान में केवल 7115 क्यूसेक पानी बचा है।
Bihar River Crisis: दक्षिण बिहार की नदियां तोड़ रहीं दम
दक्षिण बिहार में स्थिति और भी भयावह है। नवादा जिले की खुरी, सकरी, धनार्जय, तिलैया और ढाढर जैसी नदियां फरवरी के महीने में ही दम तोड़ती दिख रही हैं। स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि दशकों पहले इन नदियों में मार्च-अप्रैल तक चार से पांच फीट पानी रहता था, लेकिन अब ये केवल बरसाती नाले बनकर रह गई हैं। भूजल स्तर गिरने से प्राकृतिक सोते भी सूख चुके हैं। कैमूर जिले की सुवरा, दुर्गावती, कर्मनाशा और कुदरा जैसी सदानीरा नदियां भी अब कहीं-कहीं छिछले पानी के साथ अपनी अंतिम सांसें गिन रही हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। भोजपुर और बक्सर में भी स्थिति अलग नहीं है, जहां गाद और अतिक्रमण ने धर्मावती, कंचन और काव जैसी नदियों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
उत्तर बिहार की बूढ़ी गंडक नदी की हालत भी पतली है। एक हालिया शोध के अनुसार, मानसून में इसकी जल गुणवत्ता खराब श्रेणी में पहुंच जाती है, जिसमें गंदलापन निर्धारित सीमा से बहुत अधिक पाया गया। सारण में कभी 96 किलोमीटर लंबी धारा वाली दाहा नदी अब लगभग लुप्त होने की कगार पर है। नालंदा और जहानाबाद में तो स्थिति और भी विकराल है। नालंदा की पंचाने, मुहाने, लोकाइन और सकरी समेत करीब 40 छोटी-बड़ी नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं, जिससे जिले का औसत भूगर्भ जलस्तर 44 फीट तक नीचे चला गया है। जहानाबाद में फल्गु, मोरहर और दरधा जैसी नदियों में पानी का नामोनिशान नहीं है। बालू के अवैध और अत्यधिक दोहन ने इस संकट को और गहरा दिया है। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
विशेषज्ञों ने बताई संकट की असली वजह
जल विशेषज्ञ इस भयावह स्थिति के लिए कई कारकों को जिम्मेदार मानते हैं। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, नदियों के जलग्रहण क्षेत्र में अंधाधुंध अतिक्रमण और गाद का जमाव प्रमुख कारण हैं। नदियों के किनारे अवैध निर्माण और कचरा फेंके जाने से उनकी प्राकृतिक धारा बाधित हुई है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। भूजल के अनियंत्रित दोहन ने भी जलस्रोतों को सुखाने का काम किया है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि समय रहते जल संरक्षण और नदी पुनर्जीवन के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले गर्मी के महीनों में बिहार को अभूतपूर्व जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
इस संकट से उबरने के लिए तत्काल और व्यापक कार्रवाई की आवश्यकता है। वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देना, पारंपरिक जलस्रोतों जैसे ‘चुआं’ और तालाबों को पुनर्जीवित करना, नदियों से अतिक्रमण हटाना और नियमित गाद सफाई जैसे कदम उठाने होंगे। इसके साथ ही, भूजल दोहन को नियंत्रित करने और जल संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता लाने की भी सख्त जरूरत है। फरवरी में जून जैसे हालात एक चेतावनी हैं कि प्रकृति का धैर्य अब जवाब दे रहा है और अगर हम अब भी नहीं संभले, तो भविष्य बहुत अंधकारमय हो सकता है।







