Bihar Trauma Center News: सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों की जान बचाने के लिए बिहार सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य में ट्रॉमा सेंटरों और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए स्वास्थ्य विभाग तेजी से तैयारी कर रहा है। इसी क्रम में, एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया था जिसमें रणनीतियों पर विचार-विमर्श किया गया।
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बिहार में ट्रॉमा सेंटर की नई व्यवस्था
बुधवार को पटना के बापू टावर सभागार में राज्य स्वास्थ्य समिति और बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने मिलकर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला में स्वास्थ्य, पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने भाग लिया। उन्होंने सड़क दुर्घटना के बाद पीड़ितों को ‘गोल्डन ऑवर’ यानी दुर्घटना के पहले घंटे में त्वरित और प्रभावी इलाज मुहैया कराने की रणनीति पर विचार-विमर्श किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस महत्वपूर्ण शुरुआती घंटे में मरीज को सही इलाज मिल जाता है, तो उसकी जान बचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। सरकार का उद्देश्य इसी गोल्डन ऑवर का अधिकतम लाभ उठाना है ताकि सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम किया जा सके।
ट्रॉमा सेंटरों की समीक्षा और रेफरल सिस्टम में सुधार
कार्यशाला को संबोधित करते हुए राज्य स्वास्थ्य समिति के प्रशासी पदाधिकारी राजेश कुमार ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग राज्य के सभी ट्रॉमा सेंटरों को आधुनिक और पूरी तरह से क्रियाशील बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वास्थ्य मंत्री का भी यही निर्देश है कि सभी ट्रॉमा सेंटरों का संचालन उच्च गुणवत्ता के साथ हो। इसका मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि गंभीर मरीजों को इलाज के लिए अन्य बड़े शहरों की ओर भटकना न पड़े।
प्रशासी पदाधिकारी ने अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए कि वे अगले 15 दिनों के भीतर अपने-अपने क्षेत्रों के ट्रॉमा सेंटरों का भौतिक निरीक्षण करें। उन्हें मानव संसाधन, डॉक्टरों, नर्सों की संख्या, चिकित्सा उपकरणों, बेड, जीवन रक्षक दवाओं और अन्य संसाधनों की कमी को चिह्नित कर विस्तृत रिपोर्ट राज्य मुख्यालय को सौंपने को कहा गया है। यह कदम व्यवस्थाओं को तुरंत दुरुस्त करने में सहायक होगा।
राजेश कुमार ने सड़क दुर्घटना के मामलों में अक्सर देखी जाने वाली सुस्त रेफरल व्यवस्था पर भी अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मरीज को प्राथमिक केंद्र से दूसरे अस्पताल रेफर करने में अमूल्य समय बर्बाद हो जाता है, जो कई बार जानलेवा साबित होता है। इस समय की बर्बादी को कम करने के लिए एक विशेष और त्वरित रेफरल प्रोटोकॉल तैयार किया जाएगा।
इसके अतिरिक्त, आपातकालीन स्थिति में एंबुलेंस की कमी को पूरा करने के लिए राज्य में संचालित सभी निजी एंबुलेंस की डिजिटल मैपिंग की जाएगी। इस पहल से दुर्घटनास्थल के सबसे नजदीक मौजूद एंबुलेंस को तुरंत ट्रैक किया जा सकेगा और पीड़ित तक जल्द से जल्द सहायता पहुंचाई जा सकेगी, जिससे Bihar Road Safety में भी सुधार होगा।
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सड़क सुरक्षा जागरूकता और पुलिस का समन्वय
कार्यशाला में मौजूद बिहार के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (यातायात) मोहम्मद अली अंसारी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि केवल स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने मात्र से सड़क हादसों की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हो सकता। दुर्घटनाओं की दर में कमी लाने के लिए ग्रामीण स्तर तक सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों का व्यापक जागरूकता अभियान चलाना अत्यंत आवश्यक है।
एडीजी ने कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि लोगों को हेलमेट पहनने, सीट बेल्ट लगाने और ओवरस्पीडिंग से बचने के लिए लगातार जागरूक किया जाना चाहिए। साथ ही, सड़क दुर्घटना पीड़ितों को सरकार की ओर से मिलने वाली क्षतिपूर्ति (मुआवजा) राशि समय पर मिल सके, इसके लिए पुलिस और प्रशासन को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि राज्य के सभी क्रियाशील ट्रॉमा सेंटरों की सूची और वहां उपलब्ध सुविधाओं का डेटा जिला प्रशासन और स्थानीय पुलिस के साथ साझा किया जाए। ऐसा करने से आपातकालीन स्थिति में पुलिस घायल व्यक्ति को बिना वक्त गंवाए सही अस्पताल तक पहुंचा सकेगी और अमूल्य जीवन बचाया जा सकेगा।
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बिहार सरकार का यह प्रयास सड़क हादसों में घायल होने वाले लोगों के जीवन को बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। उम्मीद है कि इन कड़े निर्णयों और नई रणनीतियों से राज्य में सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली मौतों की संख्या में कमी आएगी और घायलों को बेहतर और समय पर चिकित्सा सुविधा मिल सकेगी।







