

Bihar Water Crisis: कभी जिसकी पहचान नदियों के कलकल स्वर से थी, आज वही बिहार सूखे कंठों की आशंका से घिरा है। आईआईटी पटना की हालिया रिपोर्ट ने जो भयावह तस्वीर पेश की है, वह बताती है कि आने वाले पच्चीस साल बिहार के लिए पानी की बूंद-बूंद को तरसने वाले हो सकते हैं। एक समय था जब बिहार की धरती को ‘नदियों का प्रदेश’ कहा जाता था, लेकिन अब भविष्य की यह डरावनी तस्वीर चिंता पैदा कर रही है।
बिहार जल संकट: क्या 2050 तक प्यासा हो जाएगा बिहार? IIT पटना की चेतावनी और सरकार का ‘रिवर्स प्लान’!
बिहार जल संकट: क्या कहते हैं विशेषज्ञ और सरकार की योजना
आईआईटी पटना द्वारा जारी की गई रिपोर्ट ने बिहार के भविष्य को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, यदि वर्तमान दर से पानी का दोहन जारी रहा, तो साल 2050 तक बिहार के कई इलाके भीषण जल संकट की चपेट में आ जाएंगे। यह स्थिति राज्य की कृषि, पर्यावरण और जनजीवन के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेजी से बढ़ती जनसंख्या, अनियोजित शहरीकरण और भूजल में कमी इस संकट के मुख्य कारण हैं। एक तरफ जहां नदियों में पानी का स्तर घट रहा है, वहीं दूसरी तरफ भूजल का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है, जिससे भूमिगत जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।
यह रिपोर्ट राज्य सरकार के लिए एक वेक-अप कॉल है, जिसने अब इस चुनौती से निपटने के लिए विभिन्न रणनीतियों पर विचार करना शुरू कर दिया है। सरकार इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए एक “रिवर्स प्लान” पर काम करने का दावा कर रही है। इस योजना के तहत नदियों को पुनर्जीवित करने, वर्षा जल संचयन को बढ़ावा देने और जल संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो। देश की हर बड़ी ख़बर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें: https://deshajtimes.com/news/national/
पानी बचाने के लिए क्या हो रहा है?
सरकार और जल संसाधन विभाग इस गंभीर चुनौती से निपटने के लिए कई कदम उठा रहे हैं। इनमें प्रमुख नदियों की सहायक धाराओं और पुरानी जल संरचनाओं को फिर से जीवित करना शामिल है। इसके साथ ही, वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग) को अनिवार्य बनाने और चेक डैम जैसी संरचनाओं के निर्माण पर भी जोर दिया जा रहा है। गांवों और शहरों दोनों जगह लोगों को पानी के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए जागरूक किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ सरकारी प्रयास ही काफी नहीं होंगे, बल्कि इसमें जनभागीदारी भी अत्यंत आवश्यक है। हर नागरिक को पानी बचाने की जिम्मेदारी लेनी होगी। इस संबंध में कई पर्यावरणविद् सुझाव दे रहे हैं कि कृषि पद्धतियों में भी बदलाव लाकर कम पानी में होने वाली फसलों को प्राथमिकता दी जाए। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। इसके अलावा, औद्योगिक इकाइयों द्वारा पानी के पुनर्चक्रण (रिसाइकिलिंग) को भी बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि ताजे पानी की खपत कम हो सके। यह सुनिश्चित करना होगा कि 2050 की तस्वीर उतनी भयावह न हो जितनी आईआईटी पटना की रिपोर्ट में दिखाई गई है।
नदियाँ सूख रही हैं और भूजल स्तर गिर रहा है
बिहार की नदियाँ, जो कभी राज्य की जीवनरेखा थीं, अब सूख रही हैं या उनका प्रवाह कम हो गया है। गंगा, कोसी, गंडक जैसी प्रमुख नदियों का जलस्तर भी असामान्य रूप से घट रहा है, जिससे नदी के किनारे बसे इलाकों में पीने के पानी और सिंचाई की समस्या गहरा रही है। इसके साथ ही भूजल में कमी एक विकराल समस्या बनती जा रही है। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां सिंचाई के लिए मुख्य रूप से भूजल पर निर्भरता है, वहां किसानों को गहरे बोरवेल खोदने पड़ रहे हैं। यह न सिर्फ आर्थिक बोझ बढ़ा रहा है, बल्कि भविष्य के लिए एक बड़ा संकट भी पैदा कर रहा है। सरकार इस दिशा में काम कर रही है कि नदियों को आपस में जोड़ा जाए और नहरों के नेटवर्क को मजबूत किया जाए ताकि पानी की कमी वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाया जा सके। उम्मीद है कि इन प्रयासों से बिहार 2050 तक पानी की बूंद-बूंद को तरसने की स्थिति से बच सकेगा।





