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Bihar- Mithilanchal News:कांटों के “दर्द” से मुक्ति, अब बिना कांटे का मखाना, बिहार में क्रांति! लागत घटेगी, किसानों की आय बढ़ेगी, पढ़िए GOOD NEWS

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बिना कांटे का मखाना: बिहार के किसानों के लिए अब मखाने की खेती और भी आसान और फायदेमंद होने जा रही है! सोचिए, अब कटाई और सफाई के दौरान कांटों से होने वाली परेशानियों से मुक्ति मिलेगी. बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एक ऐसी ही अनोखी किस्म विकसित कर रहे हैं, जो मखाना उत्पादन में एक नई क्रांति लाएगी.

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कांटों के “दर्द” से मुक्ति: नई किस्म का विकास

अभी तक मखाने के पौधों में नुकीले कांटे होते हैं, जिससे कटाई और सफाई के दौरान मजदूरों को अक्सर चोटें आती हैं और काम करना मुश्किल होता है. इसी समस्या को दूर करने के लिए बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर की वैज्ञानिक डॉ. रीमा कुमारी को केंद्र सरकार से अनुसंधान अनुदान मिला है. इस प्रोजेक्ट के तहत बिना कांटे का मखाना तैयार किया जाएगा, जिसकी पत्तियां और डंठल कांटेरहित होंगे. यह नवाचार किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा.

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मखाने को कांटों से मुक्त करने की यह प्रक्रिया लैब में डीएनए तकनीक के जरिए पूरी की जाएगी. डॉ. रीमा कुमारी उन विशिष्ट जीनों की पहचान कर रही हैं, जो इन नुकीले कांटों के लिए जिम्मेदार होते हैं. एक बार इन जीनों की पहचान होने के बाद, जेनेटिक इंजीनियरिंग की मदद से मखाने की नई संरचना तैयार की जाएगी. इससे न केवल मजदूरों को चोट लगने का खतरा खत्म होगा, बल्कि फसल की देखरेख और भी आसान हो जाएगी.

लागत में कमी और बढ़ी हुई आय

मखाने की खेती में कटाई और कुशल मजदूरों पर काफी खर्च आता है. कांटों की वजह से अब तक मशीनों का इस्तेमाल संभव नहीं था, लेकिन बिना कांटे का मखाना आने के बाद हार्वेस्टर और अन्य आधुनिक मशीनें आसानी से उपयोग की जा सकेंगी. इससे समय की बचत होगी और कटाई के दौरान होने वाले नुकसान को भी कम किया जा सकेगा. जब लागत कम होगी और पैदावार बढ़ेगी, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिहार के मखाने की प्रतिस्पर्धा क्षमता और मजबूत होगी, जिससे किसानों की आय में वृद्धि होगी.

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बिहार का वैश्विक मखाना दबदबा

मखाना उत्पादन में बिहार का कोई सानी नहीं है. पूरी दुनिया का लगभग 80 प्रतिशत मखाना अकेले बिहार से आता है. दरभंगा, मधुबनी और पूर्णिया जैसे जिलों से यह ‘सुपरफूड’ अब अमेरिका, यूरोप और अरब देशों की थाली तक पहुंच रहा है. 16 अगस्त 2022 को ‘मिथिला मखाना’ को जीआई टैग मिलने से इसे वैश्विक पहचान मिली है. अब वैज्ञानिक स्तर पर हो रहा यह नया इनोवेशन बिहार के 10 जिलों के उन हजारों गांवों में समृद्धि लाएगा, जहां मखाना आजीविका का मुख्य आधार है.
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