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Bihar Politics का हाउसफुल, मुखौटा, गद्दारी और आई वॉश

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देशज टाइम्स | Highlights -

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Bihar Politics का Housefull । आप पढ़ रहे हैं, DeshajTimes.Com| अखबारों से आगे,DeshajTimes.Com| देशज टाइम्स पढ़िए जाग जाइए। जहां,  Bihar की BJP-JDU में फैसला हो गया। बीजेपी पायलट सीट पर है। आगामी चुनाव में बीजेपी ही इंजन बनेंगी। जदयू पीछे एसी कोच में रहेगा। अन्य घटक दल, जनरल क्लास, स्लीपर में ही सफर करेंगे। साफ है। लेकिन अभी भी स्पष्ट नहीं। वजह कई हैं। आप दिल्ली वाले हो। पहले दिल्ली संभाल लो।

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🔹 बिहार में वैसे भी चुनावी रेल छह महीनें लेट चल रही हैं

बिहार में वैसे भी चुनावी रेल अभी छह महीनें लेट चल रही हैं। दिल्ली में घमासान है। अतिशी दुविधा लेकर खड़ी है। पहली कैबिनेट में महिलाओं के लिए पचीस सौ देने का वादा क्यों पूरा नहीं हुआ। पीएम मोदी ने तो खुलेआम चुनाव से पहले भरे मंच से कहा था, पहली बैठक में…मगर यहां तो सीएम रेखा गुप्ता कह रहीं हैं। सरकार का खजाना ही खाली पड़ा है।

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🔹 यहां, जातिगत थाली फुल से क्वार्टर प्लेट पर ना जाएं

ऐसे में, बिहार का क्या होगा? क्या यहां की जनता भी फुल प्लेट से निकलकर क्वार्टर प्लेट भी ना चख पाएंगीं। यह बिहार है। यहां, जातिगत थाली में अन्न परोसे जाते हैं। अब, पिछड़ा-अति-पिछड़ा जदयू के हिस्से में थी। नीतीश बाबू की पाले से निकलकर बीजेपी ने अपने पाले में कर लिया। मंत्रिमंडल विस्तार में इसमें भी सेंघमारी हो गई। बीजेपी सहयोगियों के भरोसे रहना नहीं चाहती। या आगे भी नहीं रहेगी। इसकी बानगी सामने है।

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🔹 क्लाइमेक्स देखिए… भागलपुर की खुली जीप की हवा पटना पहुंच चुकी थी…

अनायास, महाकुंभ की समाप्ति होते-होते दिलीप जयसवाल का हड़बड़ी में,अशुद्ध लिखा पत्र सामने आ गया। हड़बड़ी क्यों? इसलिए, पीएम मोदी के जाते-जाते नड्‌डा साहेब बिहार में प्रवेश कर चुके थे। भागलपुर की खुली जीप की हवा पटना पहुंच चुकी थी। जिस पगड़ी ने नीतीश कुमार को गद्दी से उतारने की जिद जाकर अयोध्या में उतार, वहीं छोड़ दी। उसी पगड़ी के सिपहसलारों को कैबिनेट में विशेष तवज्जो मिली।

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🔹 मतलब क्या हैं? नीतीश का हाउसफुल क्या कहता है, आगे बताएंगें..शिंदे साहेब को हल्के में ना लें…

मतलब क्या हैं? नीतीश का हाउसफुल क्या कहता है। इसपर विश्लेषण करेंगे तो साफ है। निशांत का यूं बयान आना, अनायास नहीं है। समझ के उस पृष्ठभूमि से भी जुड़ा है जहां, एकनाथ शिंदे खुद को हल्के में नहीं लेने की झिझकी भी दिखाई है, औकात पर लाने की नसीहत भी दे डाली है।

🔹 लेकिन बॉलिंग तो प्रशांत किशोर लाजवाब करेंगे, इसमें कोई शक? 

बात चाहे महाराष्ट्र की हो या दिल्ली की। बिहार इससे अछूता रह नहीं सकता। भले, केजरीवाल राज्यसभा जाकर ही संतोष भर कर लें। लेकिन, बिहार में प्रशांत किशोर मानने वाले कहां हैं? बिल्कुल शाहीन अफरीदी की तरह खौफ बनकर सामने हैं। भले, प्रशांत को सीटें कम मिलने के दावे अभी से किए जा रहे हों, लेकिन बॉलिंग तो पीएके लाजवाब करेंगे, इसमें कोई शक?

🔹 प्रशांत किशोर का कोई जातिगत आधार अभी तक

प्रशांत किशोर का कोई जातिगत आधार अभी तक छनकर सामने नहीं आया है। वह जाति के डोर से फिलवक्त तक बंधे नजर नहीं आ रहे। हर वर्ग को साथ लेकर आगे बढ़ रहे। इसका असर भी है। बिहार के भीतर की जिनती जातियां हैं, कमोबेश हर वर्ग में इनकी दखल या उपस्थिति या चर्चा है। लेकिन, जिस तरीके बीजेपी ने एमवाई समीकरण को दरकिनार किया है। यह, राजद खेमे को जितना मजबूत करता दिख रहा। उतना ही पीके के करीब भी है।

🔹 तेजस्वी सामने के स्टंप पर खड़े हैं

कोई संदेह नहीं। बिहार में अभी तेजस्वी सामने के स्टंप पर खड़े हैं। रन बनना। विकटों का गिरना अभी शुरू हुआ है। चुनाव नजदीक आते-आते रन आउट और कैच कितने लपकें और ड्रॉप होंगे, बिहार की सियासी हलक में है।

🔹 लालू प्रसाद अभी बिहार में हैं

मगर, इतना तय है। लालू प्रसाद अभी बिहार में हैं। पूरे परिवार पर समन, चुनाव आते-आते नई विसात में सलाखों के रस्म अदायगी की संभावना से इनकार भले ना किया जा सके। लेकिन, लालू ने जिस तरीके पीएम के मखाने पर बिहारी भुजा का तड़का लगाया है। मिर्ची के स्वाद तीखा कम, आंसू ज्यादा निकाल रहे।

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🔹 लालू-नीतीश-बीजेपी सब इसके हिस्से रहे हैं, मगर,

ऐसे में, बिहार में बड़ा और छोटा भाई की लड़ाई आज की बात नहीं है। लालू-नीतीश-बीजेपी सब इसके हिस्से रहे हैं, मगर, ताजा कैबिनेट विस्तार के बाद सवाल यही है? क्या जदयू का सरेंडर हो गया? नहीं, ऐसा क्षणिक है?

🔹 अगर, यूं होता, गत चुनाव में राजद को

नीतीश बिहार की राजनीति के स्लाइरिंच हैं। उन्हें क्षण, क्षण, पल-पल गैम चेंज करना आता है। तरकश में निशांत आ गए हैं। मारकता भरपूर है। उम्र ढ़लने का कोई मतलब नहीं? यह बिहार है? परिवारवाद कोई मायने नहीं रखता? अगर, यूं होता, गत चुनाव में राजद को इतनी बड़ी सीटें नहीं मिलती?

🔹 यही विचित्रिता बिहार को अलग बनाती है

यह बिहार है। इसकी समझ, देश के अन्य राज्यों से भिन्न, बिल्कुल अलग है। न खेलब, ना खेले दैब, खेलबे बिगाड़ देब…। यही विचित्रिता बिहार को अलग बनाती है। आगे भी बढ़ाती है। रोकती भी है।

बिहार में ‘हाउसफुल’ मंत्रिमंडल, बीजेपी फ्रंट सीट पर – जेडीयू बैकफुट पर

बिहार की राजनीति में नया रिकॉर्ड बन चुका है। बुधवार को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में बीजेपी के 7 नए मंत्रियों ने शपथ ली, जिससे नीतीश सरकार का कैबिनेट पूरी तरह ‘हाउसफुल’ हो गया।

🔹 कैबिनेट विस्तार के बाद नए समीकरण

नीतीश कैबिनेट में पहली बार बीजेपी के 21 मंत्री और जेडीयू के सिर्फ 13 मंत्री हुए।
पहली बार जेडीयू से ज्यादा बीजेपी के मंत्री बने।
कुल मंत्रियों की संख्या 36 पहुंची, जो संवैधानिक सीमा का अधिकतम स्तर है।

🔹 रोहिणी आचार्य का तंज – ‘मुखौटा मुख्यमंत्री’

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने नीतीश कुमार को ‘मुखौटा मुख्यमंत्री’ करार दिया और कहा –

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🗨 “कैबिनेट पर बीजेपी का कब्जा हो चुका है। नीतीश कुमार अपनी ही पार्टी के एक भी नेता को मंत्री नहीं बना सके। यह बीजेपी आलाकमान का आदेश था।”

🔹 VIP पार्टी ने भी उठाए सवाल

विकासशील इंसान पार्टी (VIP) ने साहेबगंज के विधायक राजू सिंह को मंत्री बनाए जाने पर हमला बोला। पार्टी प्रवक्ता देव ज्योति ने कहा –

🗨 “राजू सिंह ने पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों के मतदाताओं के साथ गद्दारी की है। उन्होंने सिर्फ मंत्री पद के लिए अपनी पार्टी तोड़ दी। सही अर्थों में यह मंत्रिमंडल विस्तार ‘ आई वॉश ‘ है, जिससे बिहार के लोगों को कोई लाभ नहीं होने वाला।”

🔹 संवैधानिक दायरे में कैबिनेट विस्तार

📌 संविधान के अनुच्छेद 164(1A) के अनुसार, किसी भी राज्य में मंत्री परिषद की संख्या विधानसभा के कुल सदस्यों के 15% से ज्यादा नहीं हो सकती।
📌 बिहार में 243 विधानसभा सीटें हैं, जिसका 15% = 36.45 होता है।
📌 इसलिए, अधिकतम 36 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं।

🔹 जेडीयू बैकफुट पर, बीजेपी का दबदबा बढ़ा

👉 नीतीश कैबिनेट में पहली बार जेडीयू के मंत्रियों से डेढ़ गुना ज्यादा बीजेपी के मंत्री।
👉 2020 के चुनाव के बाद पहली बार सरकार में इतने बड़े बदलाव।
👉 नीतीश कुमार की पार्टी का असर सरकार में लगातार घटता जा रहा है।

🔹 बिहार की सियासत में नया मोड़?

➡ बीजेपी के मजबूत होने से जेडीयू पर दबाव बढ़ेगा।
➡ आरजेडी और विपक्ष इसे नीतीश की कमजोरी के रूप में दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
➡ 2025 के चुनाव से पहले यह कैबिनेट विस्तार बिहार की राजनीति की नई दिशा तय कर सकता है।

क्या नीतीश कुमार फिर से सियासी दांव खेलेंगे या बीजेपी के दबाव में बने रहेंगे? बिहार की राजनीति के अगले मोड़ पर सबकी नजरें टिकी हैं।

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