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मार्च, 20, 2026
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Bihar Makar Sankranti Politics: त्यौहार कम, अखाड़ा ज्यादा, OUT और IN… चली- चली रे पतंग मेरी चली रे .. हवाओं का रुख बदला सा है…

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Bihar Politics: अक्सर बिहार की राजनीति में पर्वों का रंग चुनावी समीकरणों से गहरा हो जाता है। मकर संक्रांति महज एक त्योहार नहीं, बल्कि सूबे की सियासत का वह अखाड़ा है, जहां दही-चूड़े के बहाने शक्ति प्रदर्शन और संदेशों का आदान-प्रदान होता रहा है। इस बार, हालांकि, हवा का रुख कुछ बदला सा है, जहां पारंपरिक ठिकानों से दूर, नए समीकरणों की आहट सुनाई दे रही है।

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बिहार पॉलिटिक्स: मकर संक्रांति पर सियासी दावपेंच और बदलती रणनीति

बिहार पॉलिटिक्स में मकर संक्रांति का बदलता मिजाज

Bihar Politics: बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन और सियासी संकेतों का मंच भी बन चुकी है। हर साल दही-चूड़ा भोज के बहाने सत्ता और विपक्ष अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे हैं, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग है। पटना की राजनीति का फोकस लालू-राबड़ी आवास या मुख्यमंत्री आवास से हटकर कुछ नए चेहरों और जगहों की ओर जाता दिख रहा है। यह सिर्फ स्थान परिवर्तन नहीं, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। बल्कि बदलते राजनीतिक समीकरणों और युवा नेतृत्व के उभार का संकेत भी है।

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मकर संक्रांति का यह परंपरागत आयोजन, जो हमेशा से राजद और जदयू जैसी बड़ी पार्टियों का गढ़ रहा है, अब छोटे दलों और व्यक्तिगत नेताओं के लिए भी अपनी सियासी ताकत दिखाने का अवसर बन रहा है। इस वर्ष, जहाँ उम्मीद थी कि लालू परिवार में ही दही-चूड़ा की सियासी दावत मुख्य केंद्र होगी, वहीं अब कई अन्य नेताओं के घर भी गहमागहमी देखी जा रही है।

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नया दौर, नए राजनीतिक दांव

यह बदलाव सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत देता है। युवा नेताओं का अपनी पहचान बनाना और पारंपरिक गढ़ों से इतर अपनी सियासी जमीन तैयार करना, भविष्य की राजनीति की एक झलक पेश करता है। आने वाले समय में ये छोटे-छोटे आयोजन बड़े सियासी परिणामों में तब्दील हो सकते हैं। आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1।

सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस पर्व के बहाने अपनी रणनीति को धार देने में जुटे हैं। जहां एक ओर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने आवास पर दही-चूड़ा भोज का आयोजन कर सबको साधने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर तेजस्वी यादव और अन्य विपक्षी नेता भी अपने-अपने स्तर पर शक्ति प्रदर्शन करते नजर आए। इस सियासी दावत के माध्यम से जहाँ जनसंपर्क साधा जा रहा है, वहीं गुप्त मंत्रणाओं का दौर भी चल रहा है।

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संक्रांति का यह पर्व, जो हर साल नए जोश और नई उम्मीदों के साथ आता है, इस बार बिहार की राजनीति में कुछ अनकहे बदलावों और भविष्य के संकेतों को अपने साथ लेकर आया है। कौन कितना प्रभावशाली साबित होता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि इस बार की मकर संक्रांति सिर्फ दही-चूड़ा तक सीमित नहीं है, आप पढ़ रहे हैं देशज टाइम्स बिहार का N0.1। यह बिहार की बदलती सियासत का दर्पण भी है।

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